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Thursday, January 12, 2012

हे मेरे प्रेम! तुम लौट आओ ना फिर

हे मेरे प्रेम! तुम कहाँ हो?क्यूँ ना नजर आते हो आजकल मुझे।क्या तुम अबतक मुझसे रुठे हो,कभी आवाज भी नहीं देते या भूला दिया है तुमने मुझे।मै अब भी अक्सर हर रात तुम्हारा इंतजार करता हूँ उसी छत पर जहाँ तुम मुझसे पहले ही पहुँच कर मेरा इंतजार करते थे और मेरे पहुँचने पर दुसरी तरफ मुँह फेर कर अपनी नाराजगी जाहीर करते थे।जब मै तुमको मनाकर थक कर एक ओर बैठ जाता तो तुम खुद ही आ जाते थे मेरे पास।हे मेरे प्रेम! तुम तो मेरी प्रेमिका के स्वरुप में थे ना जो मुझपर जान छिड़कती थी,जो मुझको बेतहासा पागलों की तरह चाहती थी,जो मेरे बगैर एक पल भी नहीं रह पाती थी।पर क्या आज मौसम के बदलने से मेरी प्रेमिका भी बदल गयी,प्रेम का स्वरुप भी बदल गया।
हे मेरी सलोनी साँवली! मेरे साँसों में बसने वाली।क्या अब तुम्हें जरा भी फिक्र नहीं मेरी इन धड़कनों का।तुम्हारे बिन ये बड़े रुक रुक के चलते है।पता है तुम्हें हर वो रात कैद है अब भी मेरी यादों में।जब भी याद करता हूँ हँस पड़ता हूँ।जानती हो क्यों?क्योंकि कभी कभी ताजुब्ब सा होता है तुम्हारे ना होने पर भी मेरे होने का।हे प्रियतमा! आँसू बहते है पर अब इनका मोल नहीं है जो तुम नहीं हो इन्हें पोंछने वाली।क्या मेरे सारे प्रश्नों का जवाब दिये बिना ही तुम चली जाओगी।अक्सर तुम कहती थी "आप सवाल बहुत करते हो" पर अब क्यों ना आती हो जवाब लेकर मेरे बेवजह सवालों का।
तुम्हें याद करते करते रात ढ़लती जाती है और मै ख्वाब में ही सही तुमसे मिलने की जिद लिये आँखों को जबरदस्ती बंद करता हूँ।पर ना जाने क्यूँ तुम मेरे ख्वाबों से भी रुठ गयी हो।हर सुबह इसी उम्मीद के साथ आँखें खोलता हूँ कि कही तुम्हें सामने देख लूँ पर स्मृति की रेखाओं से बहुत दूर हो गयी हो तुम।ह्रदय का हाल बड़ा ही अजीब है आजकल तुम्हारे बाद।मेरा ये लाचार प्यार बस आहें भरता भरता हर दिन गुजारता जाता है।तड़पता हूँ और फिर मुस्कुरा लेता हूँ ये सोच कर की कही ना कही,कभी ना कभी तो मिलोगे तुम।हमारे प्यार की इस कहानी में कई बार ऐसा हुआ है कि हम बार बार बिछड़ कर फिर मिल गये है।पर अब इस दिल को सब्र नहीं है खुद पर।बेचार अक्सर पुकारता रहता है तुमको।
हे प्रियतमा! आकाश की ऊँचाईयों में कही गुम सा हो गया है मेरा वो हर एक शब्द जो मैने तुमसे कहे थे।मेरे जीवन की हर शाम बस तन्हाईयों से भरी हुई है।महफिल में भी सूनापन घेरे हुये है मुझे और हर पल तुम्हारी याद तुम्हें भूलने के सभी प्रयत्नों को व्यर्थ सा करता जा रहा है।शायद तुम्हारे बाद अब मेरे जीवन में रात का ऐसा सन्नाटा छाया है जिसे तुम्हारे प्यार के अलावे और कुछ नहीं मिटा सकता।सुनता हूँ अब भी धड़कनों में तुमको और उस चाँद से रोज सिफारीश करता हूँ तुम तक मेरे अनकहे संदेशों को पहुँचाने का।हे प्रियतमा! क्या तुम अब उस चाँद में मेरी छवि नहीं निहारती।क्या तुम सच में अब मुझसे प्यार नहीं करती या बस दो पल का प्यार ही मेरी किसमत में था।
तुम्हारे बाद कुछ अजीब सी बहती है ये हवायें कभी कानों में कुछ कहती है तो कभी रास्ते के पत्तों को उड़ाकर जमीन पर तुम्हारा नाम लिख देती है।तुम्हारे बिन चाँद मुझको दिलकश नहीं लगता।फिकी लगती है सारी फिजाएँ और मायूस सा लगता है हर आलम।पता है तुम्हें तुम्हारे बाद अब वो झील भी नहीं बहती पहले की तरह।खुद ही अपने आँसूओं को धोता धोता दिन से रात कर देता है।सामने का वो मोड़ जहाँ से हम अक्सर एक दुसरे की हाथों में हाथे डाले चलते रहते थे अब नहीं मुड़ता कही।शायद वो भी अब लक्ष्यविहीन हो गया है तुम्हारे बाद।तुम्हारे बाद बस यादों की हवायें चलती है जो मेरे ह्रदय पृष्ठों पे रेत से लिखे तुम्हारे नाम को पल भर में तहस नहस कर देती है।तुम्हारे बाद आसमां में चाँद काले बादलों की ओट में ही छुपा रहता है।शायद अब उसकी हिम्मत नहीं मुझसे नजरे मिलाने की या कही तरस आता हो उसे मेरे हाल पर।
एक बात पुछू तुमसे क्या मेरे बाद तुम्हें मेरी याद नहीं आती कभी।क्या बस चंद पलों में कई जन्मों के रिश्ते को भूला दिया तुमने।क्या तुम्हें मेरी कोई परवाह नहीं होती।शायद तुम सच में भूल चुकी हो मुझे तभी तो अब कभी हिचकीयाँ भी नहीं आती मुझे।जानती हो आज मैने अपनी आँखों से एक करार किया है।तुमसे मिलने पर इनसे बहे हर एक आँसूओं का बदला लूँगा।टूट चुका हूँ पूरी तरह और बिखर गये है मेरे सारे ख्वाब किसी रेत के महल की तरह।मै तुमको नहीं खोना चाहता हूँ इसलिए हर दर्द को मरहम बना कर खुद में ही छुपाये रखता हूँ।बहुत कुछ खो दिया है मैने अब तक।पर यदि इस बार तुम्हें खो दूँगा तो कही बर्दाश्त ना कर पाऊँ और तुम्हारे बाद हमेशा के लिये आँखें बंद कर सो जाऊँ।यदि अब तुमने थोड़ा भी देर किया आने में तो सच में हे प्रियतमा! मै चिर निद्रा की आगोश में चला जाऊँगा सदा के लिये तुमसे और इस दुनिया से काफी दुर।हे मेरे प्रेम! तुमने क्यों खेला मेरे साथ ऐसा खेल जिसने मुझे बस दर्द के सिवा कुछ ना दिया।हर जीतने में भी हारता रहा मै और तू हर बार मुझे आँसूओं से पुरस्कृत करता रहा।हे मेरे प्रेम! लौट आओ ना फिर बस एक बार मेरी खातिर।बस एक बार.....।क्योंकि तुम्हारे बिना कुछ नहीं है मेरे पास सिवाये दर्द  के और पुरानी यादों के।तुम ही कहो ना कितना सहूँ मै दर्द।हे मेरे प्रेम! तुम लौट आओ ना फिर।मुझे पता है तुम गुस्सा हो मुझसे क्योंकि मैने तुम्हारी कदर ना कि पर क्या मुझे बस एक बार मौका नहीं दोगे सुधरने का।

Friday, November 11, 2011

यादों के आसमान में जगमगाते गुजरे लम्हों के सितारे

अभी अभी जिस वक्त को याद कर रहा हूँ,आज उससे काफी दूर निकल आया हूँ मै।ना अब वैसी स्वच्छंदता है मेरे उन्मादों में और ना ही प्रेम की वैसी स्मृति है आज।आज कई जिम्मेदारियों में दबा दबा सा ख्वाहिशों का वो परिंदा थोड़ी दूर निले गगन में भी उड़ पाने में असमर्थ है।बस भविष्य की कई उम्मीदें और अवसर मुझे मेरे सामने दिख रहे है।काफी व्यस्त हो गया हूँ मै आजकल।पर अपनी व्यस्तता के बावजूद भी मै अक्सर रात में थोड़ा पहले ही अपने बिस्तर पर चला जाता हूँ,ताकि कुछ क्षण तुम्हारी यादों के आसमान में अपने गुजरे सुनहरे लम्हों के सितारों को चमकता देख सकूँ।स्मृति में ही सही पर अब भी तुम रोज मेरे ख्यालों में आती हो,जब जब मै थक कर आँखों को मूँदता हूँ चैन के लिये तुम्हारी यादें मुझे फिर बेचैन कर जाती है और मै कई साल पिछे चला आता हूँ तुम्हारे साथ साथ।
अब माहौल सुकुन का होता है।ना कोई चिंता,ना कोई परवाह और ना ही कोई चाहत किसी और कि तुम्हारे सिवा।अब बस तुम होती हो और मै।ना कोई भूत होता है और ना ही कोई भविष्य।बस वर्तमान की चौखट पर खड़े हम तुम सुनहरे कल के सपने संजोते रहते है।कभी तुम नाराज हो जाती हो मेरी खामोशि से और फिर मै तुम्हें बतलाता हूँ अपनी खामोशि का कारण।शायद कल की व्यस्तता और जीवन के बदले हुये स्वरुप की झलक पा लेता हूँ मै और कभी कभी सोचने लगता हूँ कल के बारे में।हर रात तुम्हारा इंतजार और चाँदनी ओढ़े रात में चाँद के सामने तुम्हारा दीदार।नहीं भूल सकता मै कभी उन गुजरे लम्हों को।बस प्यार,प्यार और प्यार।ना कोई तकलीफ,ना कोई गुस्सा बस प्यार।जिंदगी में पहली बार इतना प्यार पाकर मै बड़ा अधीर हो जाता हूँ।सोचता हूँ क्या है जिंदगी वर्तमान का यह स्नेहाकाश या भविष्य का धुँधला सा वो संघर्षरत जीवन।काश कितना अच्छा होता सब कुछ बस यूँही इसी पल थम जाता और मै प्रेम के उस अनोखे बाढ़ में खुद को प्रवाहीत कर देता तन,मन और जीवन के साथ।
मौसम का बदलता नजारा और आँखों में बसा अपने प्रेम का सितारा चमकता रहता हर दिन एक नयी मिठास और अपनत्व के संग।अपना रिश्ता धीरे धीरे बहुत ही प्रगाढ़ होता जाता और तुम स्वयं मुझमे विलीन होती जाती किसी स्मृति की कोरी कल्पना सी।अब तुम मेरे सामने ना होती पर तुम्हारा स्मरण हर क्षण मेरे जेहन में बसा होता।कभी मै गीतों में सुनता तुमको तो कभी चाँद में ढ़ूँढ़ता।कभी सपनों में मिल जाती तुम तो कभी दूर गगन से परी सी आती तुम।कई बार पागलपन की हद पार कर जाता मै और बेवजह ढ़ूँढ़ता फिरता तुमको यूँही महफिक महफिल।और जब थक के आँखे मूँदता तो एकाएक तुम सामने आ जाती।हाथ बढ़ाता,छूने की कोशिश करता पर हर बार नाकामी हाथ लगती।व्यस्त रहता पर व्यस्तता में अब भी तुम्हारा स्मरण बड़ा सुकुन देता दिल को।बदल जाता मेरा सारा आवेग और मै फिर शांत हो जाता पहले की तरह।
आज यूँही छुट्टी के दिन अपनी डायरी पलटता रहा और यादों के आसमान में जगमगाते गुजरे लम्हों के सितारों को निहारता रहा।एक खाश तारिख ने एकाएक मुझे चौंका दिया।पता नहीं यह कैसा संयोग था कि बार बार बिछड़ कर हम उस रोज मिल जाते थे।पर इस बार किसी सम्भावना की गुजारिश ना थी क्योंकि अब शायद वो खाश तारिख भी सामान्य सा प्रतीत होने लगा था।उस डायरी में तुम्हारे लिये लिखे हुये मेरे बहुत से प्रेम पत्र थे जो अब तक तुम तक ना पहुँच पाये थे और ना ही मै ही कभी कह सका था उन बातों को तुमसे।वे बातें अकेले में हमेशा मुझसे पूछते "क्या है असमर्थता तुम्हारी?" आखिर क्यूँ ना कह सका तू वो बात अब तक जो न जाने कब से तूने अपने डायरी में लिख रखा है।और मै बस उन्हें ये ही कह पाता "कह दूँगा उसे उस रोज जब वो मेरी खामोशि को भी सुन लेगी।" और मेरे शब्द मेरी निःशब्दता से कुंठित होकर बस पन्नों से झाँकते रहते।
तुमसे दूर जाने के बाद क्या पाया मैने?तुमको खो देने के बाद और क्या खोना है मुझे?तुम थी तो बहुत कुछ था खोने को और पाने को भी।पर अब ना तुम हो और ना ही कुछ खोना और पाना।तुम शायद खुश हो मुझसे दूर होकर और मै अब भी बस बेचैन।तुम्हारी खुशी का कारण है तुम्हारी निश्चिंतता क्योंकि तुम जानती हो मै अपनी मजबूरियों में कुछ सीमित सा हो गया हूँ।पर मेरी बेचैनी का एकमात्र कारण है तुमसे मेरा अलगाव।शायद तुम जानती हो मै तुमसे दूर नहीं रह सकता।पर क्या करुँ समय के सामने मजबूर खड़ा हूँ।
कल रात सारी चिंताओं को भूलाकर और अपनी व्यस्त दिनचर्या से निजात पाने के लिये मै स्वच्छंदता से यादों के आसमान में आया था गुजरे लम्हों के कुछ सितारों को छूने के लिये।कुछ सितारों को मुट्ठी में कैद करना चाहता था जो सुनहरे लम्हें मेरी जिंदगी की कहानी कहते थे।हर एक लम्हें में तुम साथ थी मेरे और मै निर्भिक होकर देखता तुमको।कुछ सितारों की चमक मद्धम थी क्योंकि तुम नहीं थी उनमें और मै तुम्हारा इंतजार कर रहा था।कुछ सितारा आसमान में सबसे ऊँचाई पर चमक रहा था।वह शायद अपने गुजरे प्यार भरे अतीत के सबसे स्वर्णिम क्षणों को व्यक्त कर रहा था।वे सारे मंजर मैने आज भी कैद कर के रखे है अपनी आँखों में।कभी तुम आओ और मेरी आँखों में झाँक कर देख लो "यादों के आसमान में जगमगाते गुजरे लम्हों के सितारे।"   

Friday, August 26, 2011

ढ़ूँढ़ रहा हूँ अपने दर्द की कोई शक्ल

वह स्पर्श भूला नहीं हूँ मै या शायद मेरे जेहन में इस कदर समा गया है वो कि उससे विरक्ति स्वयं से वैराग जैसा है।दूर से आती हुई मदमस्त पवन हौले से मेरे कानों में कुछ कहती है और हर बार सुनने की कोशिश में उस स्पर्श का स्मरण हो आता है जो हुआ था मुझको उस पल जब तुम दूर थी मुझसे।वह स्पर्श शायद मेरे दर्द के मंजरो को खुद में समेटे हुये है।ज्यों छुता है मुझे सारा शरीर अद्भूत स्पंदन से कंपित हो उठता है।ह्रदय की झंकारों में एक नयी वेग का आगमन होता है जो बहा ले जाता है उन सभी यादों को जिन्हें न जाने कब से ह्रदय में कैद कर के मै खुद को निश्चिंत समझ बैठा था।
खुद से हार कर आज पेश करना चाहता हूँ अपने दर्द को तुम्हारे समीप।जिससे तुम्हें भी दर्द की शक्ल में अपनी परछायी दिख जाये और एहसास हो इसी बहाने मेरे अर्थपूर्ण दिवानेपन का।दर्द को आकार देना शायद थोड़ा मुश्किल है मेरे लिए क्योंकि जब तुम दूर होती हो तो विरह लगन में तपता हुआ सिकुड़ जाता है वो और जब पास आती हो तो तुम्हें खुद में अभिव्यक्त करने की असमर्थता से व्याकुल होकर अपना आयाम बढ़ाने की ललक में फैल जाता है।कभी यह दर्द मेरी आवाज में घुल जाता है,तो कभी नैनों में अश्रु बन नजर आता है।पर हर बार अपनी भिन्न भिन्न रुपों के संग यह मेरे ह्रदय पर आघात करता रहता है।कही ऐसा ना हो कि इस दर्द को शक्ल देता देता मै खुद अपनी स्वयं की शक्ल ही खो बैठूँ और दर्द का एक गुबार बन कर सहेज लूँ स्वयं में विरह और प्रणय के हर एक उस क्षण को जिसमें दर्द की सर्द रातों का अँधेरा मेरे भविष्य के सभी रास्तों को गुमशुदा कर दे।
बिल्कुल अकेला हूँ मै आज अपने कमरे में खुद के संग।रात की चादर ओढ़े बादलों का झुंड भी आज अपना दर्द बयां कर रहा है।सामने प्याले में रखी हुई है मेरे दर्द की दवा।पर न जाने क्यों वह दवा भी मुझे किसी मर्ज सी लग रही है आज।शराब को कैसे कराऊँ स्पर्श अपने उन होंठों का जिनपर बस तुम्हारा अधिकार है।तुमने ही शायद सौंपा था इन्हें रस की अनंत प्यालियाँ जिनकी तृप्ति मधु की इन प्यालियों में कहाँ?ये तो प्यासा ही छोड़ देंगे बीच राह में मुझे।पर तुम्हारे होंठों का वह मादक रसपान आज भी अंदर तक कही तृप्ति का एहसास कराता है मुझे।सोचता हूँ क्या करुँ,क्या ना करुँ?पर स्मरण में भी तुम्हारे स्पर्श का सुख मुझे संकोचित कर देता है ऐसा करने से।शायद कुछ दबा हुआ है इन यादों के साये में जिन पर तुम्हारा अक्स अब भी चिन्हीत हो रहा है।
हिमगिरी के हिम पिघल कर जलकण बनते जा रहे है और मेरे दर्द का हिमखण्ड आँखों से आँसू बन बरस रहा है।पर अपने खारेपन के कारण वह भी असमर्थ है मेरी प्यास बुझा पाने में।सागर के इतने पास होकर भी मै कितना प्यासा हूँ यह तो शायद मेरी प्यास को ही पता है।यह प्यास भी मेरे दर्द की ही एक शक्ल है,जो तुम्हारे सान्निध्य से ही बुझ सकती है।पता है तुम्हारा स्पर्श बस मेरे तन को नहीं झकझोरता बल्कि रुह को भी एक पल अचेतन सा बना देता है और कुछ पल शीथिल बना यह मुकदर्शक की तरह स्वयं की पीड़ित अवस्था को देखता रहता है और सोचने को विवश हो जाता है,कि क्या यह मेरे दर्द की कोई शक्ल है या मेरे शक्ल में ही दर्द का अक्स छुपा हुआ है।दर्द का पर्वत बन गया हूँ मै तुम बिन और यह तुम्हारे पास से आने वाली हर एक यादों की हवाओं से टकरा कर कमजोर होता जा रहा है दिन पर दिन।
घुल गयी है पीड़ा की कुछ सर्द लकीरें मेरे अंतरमन में और उन लकीरों में अब भी छुपा है अपना कल जो अक्सर मेरे ख्वाबों में आता था और मै तभी तुम्हें यह बताने की कोशिश करता और हर बार जाग जाता था।सागर की गहराईयों में बहती मेरे दर्द की कस्तियाँ कही मझदार में जाकर असमर्थ हो तुम्हें पुकारती है और तुम किसी किनारे सा आश्रय देती हो उन्हें।तुम्हारे पास होते हुये मुझे ऐसा एहसास होता जैसे ये पल अब यूँही थम गया है।एक पल भी आगे नहीं बढ़ेगा पर एकाएक जब मेरी हथेली खाली होती और तुम दूर चली गयी होती हो तो इन हथेलियों पर बस आँसूओं की दो बूँद ही नजर आती है।अपने दर्द को शक्ल देते देते मै अब थक सा गया हूँ।जैसे मानों वजनदार चीज को खुद में कही धारण किये चला रहा हूँ न जाने कब से।अब जब तुम नहीं हो पास तब मै चाहता हूँ सारा वजन दिल का हल्का कर लूँ और अकेला कमरे में खुद से बातें करता करता सारे राज खोल दूँ मै अपने सामने जो कब से दिल की गहराईयों में दफन थे।शायद कही कोई राज छुपाये हो खुद में मेरी दर्द की शक्ल का कोई स्वरुप।

Wednesday, August 3, 2011

शायद किसी जन्म में हम मिले थे कभी

मन कभी बिल्कुल आवारा सा बन न जाने कहाँ कहाँ से घूम कर आता है।कभी तुम्हारे साथ का पहला दिन याद करता है तो कभी उस एहसास को खोजने निकल पड़ता है जिसमें तुमसे मिलन के हर एक क्षण का लेखा जोखा अब भी वैसे ही यादों के पन्नों पे ज्यों का त्यों लिखा हुआ है।धीरे धीरे सम्मोहीत होता जाता है ये मन तुम्हारी मनगठंत कल्पनाओं में कही खोकर।पर जब हाथ बढ़ाकर छुता है तुमको तब कुछ नहीं होता है उसके पास सिवाय तुम्हारी यादों के।ये पूरी जिन्दगी क्या यह तो सात जन्म भी यूँही गुजार देगा बस तुम्हारी यादों के संग।पता नहीं कैसा मनभावन आईना है यह तुम्हारी यादों का जिसमें वो खुद को हर बार देखकर एक नयी ताजगी और उमंग के संग प्रफुल्लित हो उठता है।शायद बीते दिनों में स्वयं के बौनेपन को देख आज का यह विशाल मन अहंकारवश हँस पड़ता है।पर उसी हँसी में छुपी होती है एक ऐसी उदासी जो बस स्वयं ही देख पाता है वो और बेचैन होने लगता है।
आकर्षण के चरमोत्कर्ष पर हमारा प्यार मिला था कभी।जिसका आधार बस मै था और तुम थी।तुम वो थी जो अक्सर मेरी कल्पनाओं में किसी धुँधली तस्वीर सी आ जाती और मुझसे पूछती "शायद किसी जन्म में हम मिले थे कभी।" पर मै कुछ पल बिल्कुल शांत रहता।क्योंकि अब तक ना मुझे स्वप्न पर विश्वास था और ना ही जन्म जन्मांतर के अटूट रिश्तों की समझ।अब तक तो बस प्यार की परिभाषा मेरे लिये कुछ वैसी थी जहाँ बस आनंद का आगमन था विरह या संताप ना था।क्योंकि अभी अभी तो आया था मै प्यार के इस अनूठे खेल में शामिल होने।शायद अभी बहुत से नियम और शर्तों को मै नहीं जानता था।अभी बहुत ही कच्चा था मै,परिपक्वता आनी बाकी थी।
हर रात एक अनोखे एहसास को तकिये से दबा कर सो जाता उसपर और फिर वैसे ही तुम्हारी धुँधली सी छाया मेरे सामने आ जाती और पूछने लगती "शायद किसी जन्म में हम मिले थे कभी।" पर मुझे कहा याद था कोई जन्म पुराना।मेरी यादाश्त तो इतनी कमजोर थी कि रात का देखा हुआ ख्वाब भी भूल जाता मै सुबह तक।ऐसे में पिछला जन्म याद करना जरा मुश्किल था।यूँही जीवन में कई विचारों और भावनाओं से गुजरता हुआ एक दिन मिल गया तुमसे।याद है तुम बस स्टाप पे अकेली खड़ी बस के आने का इंतजार कर रही थी और मै तुमसे बिल्कुल अपरिचीत होते हुये भी चुपचाप तुम्हें निहारे जा रहा था।शायद कोई अदृश्य सा बंधन खीँच रहा था मुझे तुम्हारी ओर।एक पल हवा के झोंकों से तुम्हारी जुल्फ तुम्हारे चेहरे को ढ़ँकने लगी।मन हुआ की दौड़ कर जाऊँ और उन्हें सँवार दूँ।पता नहीं किस अधिकार से ऐसा करने को सोच रहा था मै।पर अगले ही क्षण एहसास हुआ तुमसे परायेपन का।
अब मुझमें एक नयी भावना का जन्म हुआ जो शायद इंतजार था।घंटों बस स्टाप पर करता रहता तुम्हारे आने का इंतजार और जब तुम आती तो यूँही निहारता रहता और तुम्हारे जाने तक एकटक देखता रहता तुमको पर कुछ नहीं कह पाता।शायद मै भूल गया था अपना कोई बिता कल पर इन नजरों को शायद अब भी याद थी वो सारी गुजरी हुई अपनी कहानी।शायद सच में तुमसे किसी जन्म का नाता था मेरा।वरना यूँही लाखों की भीड़ में क्यों तुमपे ही आकर निगाहें अटक जाती।एक रोज जब टूट गया मेरी अधीरता का बाँध तो मैने पूछा तुमसे "क्या तुम मुझे जानती हो" और तुम बड़े ही परीचित से लगे इस दिल को उस अपनी एक हँसी के साथ।उस रोज पहली बार तुम्हारे साथ बस पर बैठा मै तुम्हारी मँजिल तक गया और ऐसा लगा कि कभी की कोई अधूरी प्यास थी दबी जिसे दो बूँद नसीब हो गया हो।तुम्हारी हर अदा बोलने की,देखने की और सोचने की।न जाने क्यों कुछ जाना पहचाना सा लगा।ऐसा लगता कि कभी तुमसे मिल चुका हूँ मै पहले और अब तो मेरे ख्यालों में आने वाली वो तस्वीर भी कुछ साफ साफ सी दिखने लगी।और अब समझ आने लगा मुझे वह प्रश्न "शायद किसी जन्म में हम मिले थे कभी।"
आज सूने मन के आँगन की दहलीज पर बैठा मै सोच रहा हूँ कि क्या सच में किसी जन्म में हम मिले थे तुमसे।आज जब तुम मेरी नहीं हो।किसी गैर की हो और अब शायद तुम भूल भी गयी होगी मुझे।पर उस प्रश्न की सार्थकता आज भी है कि "शायद किसी जन्म में हम मिले थे कभी।" तब तुम सिर्फ मेरी थी और तुम पर मेरा पूरा अधिकार था।पर न जाने क्यों आज तुम मेरी नहीं हो।हो ना हो पर जरुर अपने वादे में खोट हुई होगी जब हम सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा किये होंगे।पर बहुत कम दिन की जानपहचान में भी ऐसा लगता था मुझे की तुम मेरी कोई पूर्वपरीचित हो।मेरे रुह की तमन्ना भी कुछ सुकुन सा पा लेती जब कर लेती आत्मसात उस एहसास को खुद में जिसमें तुम मेरे साथ हो हर पल।मै आज फिर इंतजार कर रहा हूँ किसी नये जन्म का और इस बार मिलना तो यूँ ना मिलना जैसे मिली हो इस बार।इस बार सारे बंधनों को तोड़कर तुम बस मेरी "तुम" बन कर आना और "मै" तो हमेशा से तुम्हारा हूँ  और रहूँगा।शायद इस वजह से कि किसी जन्म में हम मिले थे कभी।  

Wednesday, July 27, 2011

तुमने क्या मुझे याद किया है अभी

अभी-अभी मिली है खबर मुझे तुम्हारे ना होने का और मेरा वजूद कुछ क्षण बिल्कुल सन्न सा हो गया है यह जानकर कि अब तक बस तुम्हारे बिना जी रहा था वो।कुछ अलग हो गया है उससे।शायद कोई वजनदार चीज थी वो।जो कभी कभी कोमल दिल पर भी आघात कर देती थी।पर अब उसके जाने के बाद सब कुछ बेहतर है।अब वो भावनाओं की जमीन नहीं है,जिनपर प्यार की खेती होती थी कभी।पर अब बस मन के विस्तृत आकाश में कुछ यादों के बादल बचे हुये है।जो मेरी छत से ज्यादा दूर नहीं है।कभी कभी तो हाथों से ही हिला देता हूँ उनको और बरस बरस कर वे भींगो देते है मुझे बेमौसम ही अक्सर।
इन आँखों का खोजना न जाने कब पूरा होगा जब आराम से इन्हें मूँद सो सकूँगा मै।कभी तुम्हारे घर के बहुत करीब जाकर लौट आते है ये।शायद शर्म आती हो इन्हें।कही कोई देख ना ले।पर जब कभी भी खोजते खोजते थक जाते है तुम्हें सागर के किनारे जाकर अपनी कुछ मोतियाँ सौंप आते है उसे तुम्हारी यादों के सीप का।और इनकी अभिव्यक्ति की सार्थकता तब होती है जब तुम्हारी खामोश तस्वीर से दो बात कर लेते है आँखों ही आँखों में।कही यह पूछते है शायद "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी"।
अक्सर रात को जब प्यास लगती है मुझे और पानी पीने के बाद सरकती है तब लगता है कि हो ना हो पर जरुर तुमने याद किया है अभी।साँसों का अटकना तेज हो जाता है और ऐसा लगता है साँसों के कई विभाजनों में विभक्त हो कर रह गया है तुम्हारे यादों का हर एक मंजर।और कभी कभी बड़ी देर तक आती रहती है हिचकी सी।उसी क्षण भेजता हूँ मै तुम्हारे पास एक सवाल "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी"।और तुम्हारे जवाब की राह देखते देखते कब नींद आ जाती है पता ही नहीं चलता।नींद टूटने पर फिर महसूस होती है वही प्यास जिसने मन में कोई प्रश्न लाया था और तुम याद आ गयी थी फिर आज की रात।
जल रही है मद्धम सी प्रकाश कोणे में।बहुत अँधेरी रात है और मै अकेला चला जा रहा हूँ कही।शायद दीप लिये तुम ही खड़ी हो राह में क्या?जो मेरा इंतजार कर रही है और मै तो रौशनी की चकाचौंध में तुम्हारा चेहरा ही नहीं देख पा रहा।पर बस तुम्हारी दो घूरती आँखें दिख जाती है मुझे।उन्हीं आँखों से होकर उतरना है तुम्हारी धड़कनों में और आज खुद कैद हो जाना है तुम्हारी कम्पनों में।कभी कभी धड़कना भी है संग उनके और कभी तड़पना भी है याद में तुम्हारे।वैसा कोई निश्चित समय नहीं है जो हमारे द्वारा रखा गया था याद करने का और ना ही सीमित ही है सीमाएँ उसकी।पर अब भी तुम्हारी प्यास कुछ सीमित है,जो बस तुम्हारे आने से पूरी हो सकेगी।
बल्ब जल रही है दिवार पे अड़ी और पँखा चल रहा है छत से टँगा।उसका हर बार घुमना मेरी परिक्रमा को नया आयाम देता है और उसे एकटक देखता देखता मै कुछ पल पिछे हो आता हूँ कभी कभी।कभी कभी यह अनुभव सुख देता है पर कभी खुद पे ही गुस्सा आता है मुझे अपने पिछे जाने पर और पुरानी आलमारी में बँद फटे हुये कपड़ों सी तुम्हारी यादों को बार बार सीने से।पर नाइट बल्ब की मद्धम प्रकाश फिर सूचित करती है शांत हो जाने को।देर रात तक जागने की यह आदत सही नहीं है शायद तुम्हारे जाने के बाद।करकती ठंड में भी कम्बल में दुबका मै बस यही सोचता रहता कि काश ऐसा होता आज का दिन कुछ इस तरह आता कि सारे छाये हुये कुहासों को चीर देता वो।और धुँधली होती तुम्हारी छवि फिर मेरे अंतरमन में बस जाती आजीवन के लिए।और जीवन का गुजारा इस ख्वाब के संग हो जाता कि यह सच होगा एक दिन।महकती रहती अब भी मेरी हथेली जैसे मानों तुम्हारे चंदन से तन का स्पर्श कर लिया हो उन्होनें।
एक कसमकस सी है दबी अब भी दिल में कि "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी" या यूँही आती है हिचकीयाँ मुझे।तुम याद करती हो शायद तभी तो हम भी हँसते है कभी वरना उदासी भरी राहों में कभी मुस्कुराहट होती ही नहीं।कल मिला था मै तुमसे वही अपने छत की बालकोनी में खड़ी तुम किसी का इंतजार कर रही थी।क्या वह इंतजार मेरे लिए था या यूँही मै खुद को तुम्हारा प्यार समझ बैठा था।पर यह मेरा सपना नहीं है कि तुम अब नहीं हो।यह सच है जिसपर चलता चलता मै बहुत मजबूत हो गया हूँ।चट्टानों सा कठोर हो गया है मेरा वजूद पर अब भी पत्थरों में तरासता है वो तुम्हारे कुछ अनकहे अक्षर जो लब्जों पे आकर न जाने कब से रुके हुये है।कुछ अजीब से एहसासों से भरे है वे जो ना मुझे चैन से हँसने देते है और ना रोने बस मौन रहने को कहते है।

Saturday, June 25, 2011

कल रात तुमको सुना मैने

चाहता है ह्रदय फिर से तुम्हें पाने को और इस बार पाकर कभी ना खोने को।सुनना चाहता है तुम्हारी हर एक वो शिकायत जो तुम इक अनूठे अधिकार के साथ करती थी मुझसे।और मै तुम्हारी डाँट सुन कर भी हँस पड़ता था उस भोलेपन पर जो छलकता था तुम्हारी हर एक शब्द से।बड़े दिन हो गये,गये हुए तुमको पर अब तो दुनियादारी की बातें सुन-सुन कर थक से गये है मेरे कान।वो तो अब भी तुम्हारी अल्हड़पन वाली कोमल भावनाओं में भिंगोयी बातें सुनने को व्याकुल है।जिन बातों में बस अपनत्व और स्नेह की मिठास घुली होती थी।
शायद ये नहीं पता तुमको पर अब भी सुनता हूँ मै तुमको।जब-जब धड़कने धड़कती है तब-तब और जब जब साँसे चलती है तब-तब।हर उस लम्हें में तुम्हारी हँसी की खनखनाहट समा जाती है मेरे कानों में।तुमसे की गयी कुछ बातें जिनको मैने अपने मोबाईल में रिकार्ड कर लिया था आज भी आधी रात में एकाकी मन को तुम्हारे संग का एहसास दे जाते है।लगता है ऐसा कि तुमसे बात हो रही है,पर विचित्र स्थिती होती है मेरी उस समय तुम्हारे किसी बात का जवाब नहीं दे पाता मै बस मौन होकर सुनता रहता हूँ तुम्हें।जाना चाहता हूँ उस बीतें पल में और फिर पूछना चाहता हूँ तुमसे कुछ पर क्या करुँ खुद को हर बार अब अनुपस्थित पाता हूँ उस क्षण में जो बीत गया है।ना रहा वो प्यार अब और ना रहे वो प्यार करने वाले पर यादों में कैद तुम्हारी आवाज आज भी याद दिलाते है अपने प्यार के वादों और कसमों को।
आज रात की आधी पहर में जब सांसारिकता की सारी उलझनें भूल कर चैन से सोने गया बिस्तर पर तभी सहसा तुम्हारी यादों की हवायें आने लगी मेरी खिड़की से और शायद साथ में लाये कुछ बोल तुम्हारे टकराने लगे मेरी कानों से।मन में जगी इक ईच्छा ने आज सुनना चाहा तुमको और मै हेडफोन को अपने कानों में लगा सुनने लगा तुम्हारी बातों की रिकार्डींग।पता नहीं कितना पुराना था वो पर आज भी सुन कर लगता जैसे हो रही हो अब भी बात अपनी।हर बार की तरह मानों अपने प्रेम की शंका से उपजा मेरा प्रश्न पूछ बैठता तुमसे "कितना प्यार करती हो मुझसे?" और तुम बस इतना कहती "बहुत,बहुत बता नहीं सकती।"सुन कर आज बातें तुम्हारी एहसास हुआ कितने ख्वाब और भविष्य की कल्पनायें जो देखे थे हमने कल अब भी तो उतने ही अधूरे है जितने थे कल तक और अब तो शायद उन ख्वाबों के पूरे होने का ख्वाब भी नहीं आता मुझको।
हाँ तुम्हारी बातों ने तुम्हारे संग का एहसास दिया था मुझे पर इस एहसास में ना तो स्पर्श की कोई संवेदना थी और ना ही मेरे स्वयं का कोई सहयोग।बस इक मिथ्यास्पद गुजरे कल के कुछ बिखरे मोतियों को सहेज कर अपने प्रेम की माला बनाने की कोशिश कर रहा था मै और सहेज रहा था अपने आशिया के बिखरे तिनकों को जो मेरे दिल के घर को भी आज सूना सूना सा कर गये थे तुम्हारे जाने के बाद।सुनकर इक दिलासा जगा था दिल में कि चलो आज ना सही पर कभी तो हुआ था वो मेरा जिसकी चाहत ने न जाने कितनी तमन्नाएँ सौंपी थी मुझको और खुशनुमा,खुशहाल जिंदगी के कई ख्वाब दिखाये थे मुझे।जिसके साथ ने थामा था हाथ मेरा और मुझे भी सीखाया था प्यार करना पहली पहली बार मुझे।वो ही तो था पहला प्यार मेरा।
तुमको सुनते-सुनते न जाने कब नींद ने भर लिया अपने आगोश में मुझको और एकाएक इक झटके में जाग गया मै लगा कि मानों तुमने कहा हो "इतनी जल्दी क्यों सो गये तुम,देखो ना मै तो आज भी जागी हूँ रात-रात भर।"और मेरी आँखों से फिर दूर चला जाता वो रात जिनमें नींद ना था मेरी आँखों में बस रात थी और तुम्हारी बात।जी करता सुनता रहूँ हर रोज यूँही तुमको और इस झुठे दिलासे के संग देता रहूँ इक उम्मीद अपने कानों को भी कि हो ना हो इक रोज जरुर गूँजेंगे तुम्हारे कुछ शब्द इनमें जो अपनी प्यार की अधूरी कहानी को पूरा करेंगे और तुमको सुन लूँगा फिर आँखों को मूँद कर के शायद आखिरी बार।   

Saturday, June 18, 2011

प्रेमी चाँद की उलझन सा मेरा मन

हार कर आज आ बैठा मै अकेला छत पर।कितना पुकारा तुमको और तुम्हारे नाम को।अब तो शायद मेरे चारों ओर हर पल गूँजता रहता है नाम तुम्हारा प्रतिध्वनि बन कर।पर पता नहीं वो प्रतिध्वनि क्या तुमसे टकरा कर लौटती है या बस यूँ ही चली आती है मन को दिलासा दिलाने।आज मन में कई प्रश्न लिये और विरह की व्याकुलता से अधीर होकर विवश सा मन एकांत की तलाश में चाँदनी रात में छत पर ले आया मुझे।शायद आज पूछना था कई प्रश्न उसे चाँद और सितारों से या कही ढ़ूँढ़ता था अक्स तुम्हारा चाँद की प्रतिछाया में।क्या पता क्यों मन के सामने मजबूर ये प्रेमी अपनी प्रेम लगन के साथ आ बैठा आज छत पर अकेला।
आसमां में चाँद की चाँदनी से फुलझड़ियों सी जगमगाहट मानों मेरे मन में दुबक कर बैठे उस प्रेमी को प्रकाश का मार्ग दिखाती और ये दिलाशा भी देती की कही उस मार्ग में मिल जाये तुम्हारी प्रियतमा तुमको,जिसको ढ़ूँढ़ता आज तू यहाँ तक आया है।चाँद मुझे देख कर बादलों में छुपने लगा।शायद उसे अंदाजा था कि मेरे प्रश्नों के समक्ष वो भी इक प्रश्न सा बन जायेगा और उसके ह्रदय से भी उठने लगेंगे वो प्रश्न जो दबे-दबे से थे इन चाँदनी रातों में न जाने कब से।उसे एहसास होगा अपनी चाँदनी से विरह के हर उस क्षण का जब मै अपनी प्रियतमा के संग होता था और शायद मन ही मन जलता रहता था चाँद।उसकी जलन ही तो थी जो मुझे विरह के दिनों में बहुत खलती थी।तब वो मुस्कुराता था और मै अपने आँसू पोंछता बस एकटक देखता रहता उसको।पर आज वो भी तन्हा है और मै भी अकेला।
यह चाँदनी रात न जाने यादों के कितने बंद दरवाजे पर दस्तक दे गया।और यादों के किसी महल में आज भी सम्भाल कर रखी हुई तुम्हारी यादें झाँकने लगी बाहर।भूल गया मै अपना प्रश्न जो मुझे पूछना था आज चाँद से मै तो अतीत की गहराईयों में ही गोते लगाता रहा।तुम्हारे साथ का एहसास ही कुछ ऐसा खुशनुमा था कि उनके संग ही सारी उम्र गुजारने को जी करता था।एकाएक चाँद का मुझको निहारना मानों जगा गया मुझे यादों की उस स्वप्न निद्रा से और फिर मन में उभरने लगे कई प्रश्न जो चाँद से करने थे।पहले मैने ईशारा किया उसको और मुस्कुराते हुए एक ही बार में कहता चला गया अपने दिल की सारी बात।मैने कहाँ "ऐ चाँद! मै जानता हूँ तेरी चाँदनी पहुँचती होगी वहाँ भी जहाँ मेरी प्रियतमा शायद अभी भी यादों के संग खेल रही होगी और अपने सिरहाने को आँसूओं से भिगोकर रो रही होगी।।क्या तू मेरा एक पैगाम उस तक पहुँचा सकता है कि मै भी न जाने कब से राह देख रहा हूँ उस साथी का जिसके साथ के बिना जीवन बिल्कुल अधूरा सा लगता है।"
कुछ पल बिल्कुल शांत और स्थिर सा चाँद शायद कुछ सोचता रहा और फिर कहने लगा "हाँ मै तुम्हारे इस पैगाम को तुम्हारी प्रियतमा तक पहुँचाउँगा पर तेरे दिल के दर्द और विरह को कैसे बतलाउँगा?मानता हूँ मेरी चाँदनी है पहुँचती हर उस जगह पर जहाँ मै बस ठहर कर देखता हूँ,छू नहीं पाता।पर आज भी है दूर मुझसे मेरी चाँदनी।तू तो है बहुत दूर सनम से पर मै तो साथ रहकर भी,देखकर भी छू नहीं सकता उसको,प्यार नहीं कर सकता उसको।"चाँद की इस उलझन को सुन दिल में मानों भावनाओं का कोई ज्वार सा उठने लगा जो छुना चाहता था चाँद की चाँदनी को और सौंपना चाहता था चाँद को उसकी प्रियतमा।पता न था आज छत पे चाँद से पूछा गया मेरा प्रश्न खुद मुझे मौन कर जायेगा और अपनी प्रियतमा को भूल कर चाँद की चाँदनी को ही ढ़ूँढ़ता रह जाऊँगा आजीवन।
लगा ऐसा कि मेरी हथेली पर टपक कर आँसूओं की बूँद आ रही है जो शायद विरह के आशिक उस चाँद की है।जो देखता है,निहारता है अपनी प्रिया को पर दिल की उलझने दिल में ही सीमट कर रह जाती है।बेचारा शर्मीला कह भी नहीं पाता दिल की बात।अब पता चला उन दिनों जब मै साथ होता था अपनी जिन्दगी के क्यों जलता रहता था ये चाँद।शायद उस जलन में छुपी हुई थी प्यास अधूरी अपनी प्रियतमा को पाने की।दुनिया के सभी प्रेमियों को उनका प्यार सौंप कर भी आज ये चाँद और चाँदनी क्यों इतने दूर है खुद से।क्या दूर से ही प्रेम का अमिट स्पर्श छू जाता है उनके दिलों को और शायद ये दूरी करती है इस अनोखे प्यार को पूरी।

Sunday, June 12, 2011

कभी तुम मेरी इन धड़कनों की फिक्र भी कर लिया करो

याद आने लगा आज सदियों बाद फिर से वो दिन जब तुमसे नहीं मिला था,ना हुई थी बात अपनी,ना थी कोई जान पहचान तुमसे।पर ये दिल ना जाने क्यों तुमको अपना मान बैठा था।तुमसे जब पहली बार बात हुई थी अजीब हालत थी इन धड़कनों की।मुझसे ज्यादा अधीर तो बेचारे ये ही हो रहे थे।धड़कती रहती थी हर पल धड़कन रुकने का नाम ही नहीं लेती और  इक अद्भूत आनंद सा समाता जाता था मेरी इन धड़कनों में।जिन्दगी में पहली बार अधीरता भी कुछ ऐसा खुशनुमा माहौल पैदा कर रही थी जिसमें सब कुछ स्थिर था।बस दिल की धड़कन ही चल रही थी कभी हौले हौले तो कभी जोर से।
इन धड़कनों में कैद है आज भी उस पहले दिन से आखिरी दिन तक की हर एक तुम्हारी साँस जिनको मेरी साँसों ने बस महसूस किया था।इन धड़कनों की अधीरता तो बस बेबाक थी दौड़ते रहते थे मीलों तक और मै स्थिर बस स्थिर कुछ सोचता रहता।कई बार जब तुमसे प्यार का इजहार करना चाहा था मै,इन धड़कनों की वजह से ही रुक गया था।डरता था कही मेरी इन धड़कनों के प्रवाह का किसी को पता न चल जाये।ऐसे ही कही भी,कभी भी जब तुम्हारा नाम अनायास ही टकरा जाता था मेरे होंठों से फिर तो देखते ही बनती थी इन धड़कनों की बेचैनी।


एक बार तुमने रख दिया था हाथ मेरी इन धड़कनों पर और बेचारे गुमशुम से ये भी ना कह सके कि वो तो हर पल बस धड़कते है तुम्हारी खातिर।शायद उस पल धड़कनों का वेग जो तेज हो गया था वो तुम्हें कुछ कहना चाहते थे।पर निःशब्द भावों को नहीं समझ पायी तुम।क्यों तुम्हारे पास होने पर तेज हो जाते है ये और जब तुम्हारे जाने का समय आता है,तो फिर वही धक धक।पर शायद तुम्हें नहीं थी परवाह इन धड़कनों की जिनके धक धक की हर झंकार में बस तुम्हें पाने की इक अधूरी प्यास सी बजती थी,जिसे बस मै ही सुन पाता था,तुम नहीं।क्या तुम्हें महसूस नहीं होता था प्रवाह इन धड़कनों का जब तुम इनको छुती थी।
होंठों की सक्रियता और आँखों की बेचैनी तो समझ पाती थी तुम पर भावनाओं के उस दबे आशिक इन धड़कनों की फिक्र क्यों ना थी तुम्हें?ऐसा लगता ये धड़कन जल्दी जल्दी से किसी मँजिल तक पहुँचना चाहते है दौड़ कर पर मेरी विवशता के सामने वो भी विवश है।तुम्हारे ना होने पर थोड़े शांत रहते थे वो पर ज्योंही ख्यालों की जमीन पर उतर आती थी तुम धीरे से ये संवेदनाओं की अलौकिक रेस में जुट जाते थे।ख्वाब में आज भी तुम्हें सामने देख कर इन धड़कनों को शायद अब भी तुम्हारे आने का इंतजार है।
अब शायद सब कुछ रुक सा गया है तुम्हारे जाने के बाद पर आज भी न जाने किसकी खातिर ये धड़कते रहते है।शायद आज भी विश्वास है इन धड़कनों का तुम पर या इनका वो साझा जो इन्होनें तुम्हारी धड़कनों से किया था इन्हें अब भी देता है प्रवाह धड़कने का।शायद जिन्दगी के अंतिम क्षणों में जब साँस छुटने की बारी आये तब भी ये पागल धड़कन माँग ले कुछ वक्त और धड़कने को तुम्हारी खातिर।न जाने कैसा महसूस करते है ये बेवजह धड़क कर ये तो मुझे भी नहीं पता पर सच में इन धड़कनों की बदौलत ही आज भी तुम जिन्दा हो मेरी यादों की भूली बिसरी कहानी में।आज भी इन धड़कनों का फिक्र करने वाला शायद नहीं है कोई पर महसूस करने वाला तो है न।
तुमसे दूर होकर हर बार मैने महसूस किया है वो खालीपन जो तुम्हारे संग होने पर कितना भरा भरा सा होता था,जो मेरी साँसों को इक नयी जीवन उर्जा देता था।कई बार दुखाया दिल मैने तुम्हारा पर हर बार मेरा दिल समझा लेता था तुम्हारे दिल को और वो बंधन जो शायद अटूट है हमारे प्यार का जुड़ जाता था फिर से।पर इस बार तुम्हारे जाने के बाद क्या कहूँ बड़ी जोर जोर से धड़कते है ये धड़कन पर इन धड़कनों को कहाँ मालूम की कोई फिक्र ही नहीं उसे जिसकी खातिर बेवजह धड़के जा रहे है ये।कितना भी धड़क ले ये पर वो बिछुड़ा साथी अब कहाँ आने वाला जो शांत कर सके इन धड़कनों को और बस एक बार हाथ रख कर इनपर करा दे ये एहसास इनके फिक्र का।

Sunday, June 5, 2011

क्यूँ आकर फिर चली गई तुम?

सच में कुछ बदलाव तो था इस बार की अपनी मुलाकात में।इस बार वो इंतजार न था और ना था वो प्यार जो मै तुमसे करता था।शायद मुझे भी आभास हो रहा था इसका पर पता नहीं क्यों वो एहसास फिर धड़कनों में समा ही नहीं पा रहा था।वो खुमारी जो झलकती थी मेरी आँखों से और मेरे दिल के धड़कनों के संग धड़कती रहती थी और जो मुझे दिवाना बनाती थी तुम्हारे प्यार का।अब मेरे जेहनोदिल में उतरती ही न थी।कुछ ऊबा ऊबा सा मै तुम्हारे बातों का जवाब देता और तुमसे बात कर ऐसा लगता कि अपने प्यार पर कोई एहसान कर रहा हूँ।
फिर रात होती वैसी ही चाँदनी और दिलकश जैसा हुआ करती थी कभी जब प्यार के मदहोश पलों में खोये रहते थे हम।आँखों में ना नींद होता और ना अपनी बातें कभी खत्म होने का नाम लेती।पर इस बार तो नींद से मानों मुहब्बत हो गई थी मुझे तुम्हारे न होने के दिनों में।बड़ी जल्दी मै सो जाता और तुम बस इंतजार करती रहती।मै वही हूँ,तुम वही हो पर शायद प्यार का तजुर्बा जरा बदल गया है।वो प्यार जो कभी नई रंगत लेकर आया था मेरी जिंदगी में आज बोझ सा महसूस हो रहा था।और उस बोझ तले दबा दबा सा मेरा प्यार फिर जुदाई का डर दे देता था कभी कभी।


पता था मुझे एक दिन फिर तुम चली जाओगी मुझसे काफी दूर और फिर चाह कर भी बुला ना पाऊँगा तुम्हें।किस अधिकार से आवाज दूँगा तुम्हें।क्या कहूँगा आओ फिर से एक एहसान कर दो खुद पे।तुम मुझसे इतना प्यार करती थी पर शायद मै प्यार के काबिल ही ना था।कई बार तुमने पूछा "क्या कारण है इस बदलाव का" और मै बस यही कहता "सब तो वैसा ही है,कहाँ कुछ बदला" और कोशिश करता अपनी असमर्थता को छुपाने की।
तुमने कहाँ कि शायद अब तक तुम प्यार को जान ही नहीं पाये हो,आज तक जो था वो बस आकर्षण था प्यार नहीं।और मै मौन रह कर शायद हामी भरता तुम्हारे इस बात पर।कभी जब तुम ना होती तो सोचता क्या सच में आज तक मुझे प्यार नहीं हुआ,अब तक जो हुआ वो बस आकर्षण था।फिर सोचता आखिर प्यार कैसा होता है?याद आता वो पहला मुलाकात,वो पहली बार जो हुई थी तुमसे बात।कितना खुश था मै कदम जमीन पर पड़ते ही न थे।लगता था कि सारी दुनिया अब बस मेरे दामन में सीमट आयी है।शायद वो प्यार के कुछ पलों को जीने की ईच्छा दे गया था मुझे उस पहली बात में और प्यार के झोंको ने मुझे बहा लिया था खुद में।


तुम आई तो ऐसा लगा सदियों से थमी मेरी साँस मानों फिर से चलने लगी हो,ऐसा लगा फिर से जीने का एक बहाना मिल गया हो।जिसे ढ़ुँढ़ता ढ़ुँढ़ता कई बार मै मौत की गलियों से घुम आया था तुम्हारे न होने पर।रात फिर हसीन होने लगी और और तारों ने गुफ्तगु करना चाहा पर मेरे दिवानेपन को देख सभी शर्मा गये और चाँद भी अपनी चाँदनी की सारी छटाये हमारे प्यार पर फैलाता रहा।छत पर मै और तुम एक दूसरे के सामने निहारते रहे अपने प्यार को और यादों के हर एक बीते पन्नों को पलट पलट कर मै तुम्हें दिखाता रहा गुजरी मुहब्बत की बातें।
पर आज क्यूँ फिर चली गई तुम बहुत दूर।उतनी दूर जहाँ तक ना मेरी आवाज जाती है और ना मेरी नजर।ढ़ुँढ़ता रहा कई रात यूँही अकेला छत पर तुम्हें।चाँद से पूछता क्या देखा तुमने उसे,पर वो मौन रह कर शायद ये कहता वो तो आज भी तेरे साथ है पर "तू ही बदल गया है रे!" देख एक बार फिर प्यार की नजरों से वो तेरे सामने ही है।और मै शायद अपनी ही भूल के बदले फिर खो देता तुम्हें।फिर जिन्दगी मायूस होकर पूछती तुमसे "क्यूँ आकर फिर चली गई तुम" और मै बेबश होकर अब इंतजार भी ना कर पाता,क्योंकि खो दिया था मैने वो अधिकार भी इस बार।

Wednesday, May 11, 2011

अब तो तुम हो साथ मेरे

हरी हरी घासों पे लेटा,खुले आसमान के निचे संसर्ग की उन्मादकता का स्वागत करता मै।तुम्हारी नीली आँखों में गगन की सारी उड़ानों को ढ़ुँढ़ता और तुम्हारे स्पर्श से मेरे रोम रोम में हर्ष की इक नयी कली का मानों प्रस्फुटन होता।तुम्हारे साथ होने का ये आभास कही कोई कोरी कल्पना तो नहीं।खुद को विश्वास दिलाने के लिए बार बार मेरा तुमको किया गया स्पर्श इन मिलन के क्षणों का मूकदर्शक बन जाता।आँखे मूँद कर आज मन के दर्पण को पूर्णतः साफ कर बीते सभी पुराने अतीत की यादों को पोंछ देता और उस दर्पण से साफ साफ देखता सुनहरे भविष्य के आने वाले हर एक पल को जिसमें तुम्हारे साथ मै जिन्दगी के हर एक अधूरे ख्वाबों को गढ़ता जिन्हें पूरा करना अब मेरी जिन्दगी का एकमात्र लक्ष्य था।
सुबह सुबह चिड़ीयों का चहचहाना,कई मिन्नतों के बाद तुमको फिर से पाना और मन की बेसुध बाँसुरी से निकलता वो राग पुराना।सब के सब मिलन के इन क्षणों को एक अलौकिक स्वरुप देते और मेरा प्यार चुपचाप दिल के किसी कोणे से कुछ कहना चाहता।शायद तुम्हें अब साथ देखकर कुछ डर सा हो रहा था उसे क्योंकि जुदाई के हर एक दर्दभरे कल को उसने अपने अस्तित्व की संरचना का एक हिस्सा मान छुपा लिया था खुदमें।उसने ही बस महसूस किया था तुम्हारे विरह की अग्नज्वाल का जिसमें जलता जलता वो अब तो बेरस सा हो गया था।मिलन और जुदाई दोनों एक सा ही लगता था उसे पर आज तुम्हें देख फिर से मानों पा लिया उसने अपना खोया अस्तित्व।
लवों पे आते कितने बात और कितने बात दिल में ही दबे दबे घुटते रहते।पर हम तो कुछ ना कहते अब बस देखते रहते तुमको।तुम्हारे चेहरे पे आयी वो स्वर्णमयी स्याह लकीरें मेरे अंतरमन के सुसुप्त तारों को एकाएक झंकृत करती और तुम्हारे संग का एहसास बुझा देता मेरे मन के प्यास को जो न जाने कितनी सदियों से,कई युगों से तुम्हारे आने की आश लिए जी रहा था।तुम पूछती "क्या तुम्हें याद नहीं अपने प्यार की वो तमाम रातें"?और मै बेचारा कैसे बताता कि उन रातों की यादों के संग ही तो जी रहा था अब तक।तुम्हें क्या पता उन बिते हर एक रातों में तुम ना होकर भी मेरे कितने पास होती थी और मेरा प्यार कैसे तड़पता था तुम क्या जानों।मै तुमसे कहता "तुम्हें याद है सब"।तो तुम बस इतना कहती "हाँ हर एक बात और तुम्हारे प्यार का साथ सब याद है मुझे,कभी नहीं भूल सकती मै"।
आसमां से उतरता कोई फरिश्ता अपने हाथों में दुनिया की सारी खुशियाँ लेकर आता और धिरे से हमारी झोली में रख चला जाता।मै कुछ कदम बढ़ाता तुम्हारी ओर और तुम अब बिल्कुल करीब होती मेरे।माहौल में फूलों की सौरभता सा बिखर जाता यादों का हर एक मंजर जिसमें मिलन और विरह दोनों का समावेश होता।यादों का आईना चकनाचूर हो जाता और हर एक टुकड़े में कही तुम्हारे साथ और कही खुद को अकेला देखता मै।फिर रात आती और थोड़ी बदली बदली सी रंगत के संग एहसास दिलाती कि "अब तो तुम हो साथ मेरे"।
दूर दूर तक कुछ ना दिखता अपने प्यार के सिवा और राहों में बिछा होता सुनहरे प्रेम के प्रणय गीतों में सराबोर तुम्हारे संग का रंगीन चादर।फूल बिछे होते चाँदनी रातों में जब मै तुमसे फिर करता अपने प्यार की दो बातें और तुम बिना कुछ सुने कहती "मुझे तुमसे इतना प्यार क्यों है जानां?"हर पल बस तुम्हारे बारे में सोचती और हर दिन तुमसे मिलने की चाहत लिए दरवाजे पर निगाहें गड़ाये क्यों करती हूँ तुम्हारा इंतजार।और मै बस यही कह पाता "शायद ये प्यार अब कुछ विशेष है,जो विरह की अग्नज्वाल में तप तप कर स्नेह और अनुराग का मिश्रित स्वरुप बन कर प्रेम की प्रकाष्ठा का आलोप है।"इस विशिष्ट प्यार का ही तो परिणाम है कि एक बार फिर तुम हो साथ मेरे।

Tuesday, May 3, 2011

जीवन के वीरान राहों में फिर तुम्हारा साथ चाहिए....

वो राह जीवन का जिसपर हम हमेशा साथ होते थे।मीलों साथ चलते और कुछ ना कहते थे।बस तुम्हारे साथ की खुशी ही तो मुझे लम्बे फासलों के दर्द को भी महसूस नहीं होने देती।रास्ते चलते,हम चलते और समय भी भागता रहता अपनी रफ्तार से बस थमी होती तो ये दिल की धड़कन।लगता ऐसा कि काश यूँही सफर चलता रहता और ना होती कभी भी शहर इस रात की।इस रात में हमदोनों बैठे होते चुपचाप एक दूसरे के सामने और पूछते दिल से दिल की बात।घंटों मौन रहने की आदत जो पहले ना थी मुझमें पर तुमने सीखाया था अपने जाने के बाद।कितने अधूरे और अप्रकाशित ख्वाब मेरे अब भी शायद दिल के किसी कोणे में पड़े इंतजार कर रहे थे स्वयं के पूरे होने का।
प्रिया! क्या तुम भूल गयी वो सारी बातें जो मैने बस तुमसे कहने के लिए सुंदर शब्दों में पिरोकर कागज के टुकड़ों पर बार बार लिखता और मिटाता दिन भर बनाता रहता और रात को तुमसे कहने की कोशिश में घंटों यूँही बिता देता।क्या ये शर्म थी मेरी या ह्रदय की अधीरता जो मै तुम्हें वो कभी ना कह पाता जिसे कहना शायद जरुरी था तुमसे।असंख्य शब्दों के शब्दकोश से बस दो चार गिने चुने ही शब्द चुन पाता जिसे तुम्हारी उपमा से अलंकृत करता।पर फिर भी मेरी विवशता न जाने क्या थी जो उन गिने चुने शब्दों में से भी बस कुछ शब्द ही कह पाता।शायद तुम्हारी उपमा के भाव से परे थे वो शब्द या मेरे लब्जों पे आके संकुचित हो जाते थे वे।वो दूर तक तुम्हारे साथ जाने के लिए मेरा दौड़ा दौड़ा आना और बस तुम्हारे पास आकर इतना कहना "क्या चलोगी तुम साथ मेरे"।इन शब्दों से मै पूछता था क्या वीरान जीवन के इस खामोश सफर में मेरा साथ दोगी तुम।इजहार प्यार का कर तो देता पर शायद तुम मेरे इस अंदाज को समझ ना पाती और बस इस पेड़ से उस पेड़ तक जाती और कहती "हो गया ना"।
यादों के पत्तें अब भी झरते रहते है उस पेड़ से जहाँ से तुम चलती थी साथ मेरे।और मेरी विवशता पे हँसते है वे सारे मौसम जिन्होनें देखा था मुझे साथ तुम्हारे सदियों से सदियों तक।मेरा तुम्हारे साथ चलते जाना और मँजिल पर आकर ये एहसास होना सफर तो खत्म हो गया।कई रोज उन वीरान राहों पे आहटे तुम्हारी आती थी मुझे लगता था कि आज फिर तुम साथ चलोगी मेरे इस पेड़ से उस पेड़ तक।पता है शायद जिन्दगी अब इस पेड़ से उस पेड़ तक ही सीमट के रह गयी है और प्यार के हर एक किस्से मानों इन राहों में ही खुद को ढ़ुँढ़ते फिर रहे हो।वे किस्से जो ना तो कभी कहे मैने तुमसे और ना ही सुना तुमने कभी।वो बस दिल की दहलीज से झाँक कर यादों के मौसम को देख लेते है कभी कभी और अपनी दास्ता बयां करते है खुद ब खुद मेरे दिल में।तुम्हारे साथ की कल्पना में हर पल गुजरे कल में रहना ही आज मेरी पहचान है,शायद वो भूत ही मेरा वर्तमान है।
पतझड़,बसंत और न जाने कितने मौसम ने कई बार मुझे भींगाया है,वो राह भी भींग जाता है और वो दोनों पेड़ जहाँ से चलकर जहाँ तक चलती थी तुम साथ मेरे वो भी अपने पत्तों के संग भींगते रहते है।पतझड़ के बाद नये पत्तें मानों भविष्य की रुपरेखा गढ़ते है और बिखरे हुए सूखे एक पत्तें को सम्भाल कर रख लेता हूँ मै अपने पास।उस एहसास को जो मुझे तुम्हारे साथ होने का झूठा दिलासा दिलाता है और भींग भींग कर पेड़ के सारे पत्तें मेरे अंतर्मन को भी कभी भींगो जाते है।आँखों से कभी बरस लेते है यादों के मोतियों को लुटाते और कभी हँस कर अपना गम भी छुपा लेते है सबसे।अब भी राह देखता है वो सूखता पेड़ शायद तुम्हारे स्पर्श का,अब भी वो राहें सूनसान ही रहती है शायद तुम्हारे बिना।बस एक बार ही उन राहों को आबाद कर दो तुम और वीरान राहों में फिर एक बार मेरे साथ चलो ना इस पेड़ से उस पेड़ तक।आज भी लगता है कि शायद मुझे जीवन के वीरान राहों में फिर तुम्हारा साथ चाहिए।

Monday, April 25, 2011

एहसास तुम्हारे आने का



कितनी सुंदर लग रही है आज ये सारी छटायें,जो कल तक बेरंग थी मेरे लिए।साँझ की लालिमा में लिपटा बितता पहर आज अपने किसी पुराने साथी सा जान पड़ा जो अब मुझे अकेला नहीं देख पाया और अपनी मद्धम साँझ की लालिमा में यादों के संग समेटता गया मुझे।ये बदलाव शायद इसलिए था कि मुझे तुम्हारी आहटों का पता चल गया था।मै जान गया था कि तुम फिर आ रही हो मेरे पास बस मेरे प्यार की खातिर।उसी झील के किनारे जाकर कई घंटे निहारता रहा उसकी चुप्पी और खामोशी को।ये वही जगह था जहाँ हम कई घंटे बस यूँही बातें करते थे और एक दूसरे की नजर में अपने लिए कितना प्यार है जानने की कोशिश करते थे।तुम पूछती थी "कितना प्यार करते हो मुझसे?" और मै बाहें फैला कर आसमां को उनमें समेटने की कोशिश करता और बताता कि इस अनंत आसमां की चादर भी जहाँ तक सीमित हो जाये,उससे भी आगे तक कई गुणा प्यार करता हूँ तुमको।
आज वो झील फिर से मानों मेरी नजरों में आ बसा है।तुम्हारी परछाई कही झील में दिखती और तुम्हारे आने के एहसास से मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठता।विरह की उन सारी रातों को जिसे बस मैने महसूस किया था,वेदना के उन सारे क्षणों को जिसमें बस खुद ही खुद में बड़बड़ाता कितनी बातें कही थी तुमसे याद कर रहा था मै।तुमसे ये कहूँगा,तुमसे वो पूछूँगा,फिर सोचता क्या कहूँगा तुमसे "तुम तो भूल गयी थी ना मुझे,तुम्हें पता था कि मुझे कितनी याद आती थी तुम्हारी?"कभी सोचता बस देखता रहूँगा तुमको,कही नहीं जाने दूँगा।अगर तुम होगी सामने तुमसे खुब सारी बातें करुँगा और तुम्हारे पहलू में आज खुब रोऊँगा।मेरी आँखों में समाये उस झील का प्रतिबिम्ब आज बरसेगा,नहीं रोकूँगा मै।बस बरसने दूँगा।
फिर यही सब सोचता खोता गया मै पुरानी यादों में और वे यादें मेरे भविष्य की कल्पना गढ़ती रही।सोचता कि कही ऐसा न हो तुम मुझे पहचान ही ना पाओ,तो मै तुम्हें फिर वही गीत सुनाऊँगा जो बहुत अच्छा लगता था तुम्हें।तब तो शायद मेरी आवाज से पहचान ही लोगी तुम और अगर फिर भी ना पहचानी तो वो सारी तकियाकलाम जो मै कहता था और तुम दूहराती थी,उनका सहारा लूँगा।याद है तुमने कहा था,मेरा ये कहना "बोलो ना!"बहुत पसंद था तुम्हें।पर तुम्हारे जाने के बाद हर रोज इन पेड़ों से,आसमां से,झील से और रात को चाँद से बस यही कहता था मै "बोलो ना!"।पर तुम तो शायद सुनती ही ना थी मुझे।
तुम्हारे आने की आश इक नयी जिंदगी की सौगात लेकर आया मेरे लिए।वो जिंदगी जिसने मुझे प्रेरणा दी मेरे खुद के होने का।जिस प्रेम के अस्तित्व ने मेरे मिटते अस्तित्व को एक नयी जिंदगी की नींव दी थी।आज उदासी के हर उन क्षणों के निष्कर्ष का पल था,जो मिला था मुझे तुमसे तुम्हारे जाने के बाद।कई प्रश्न मेरे होंठों पर अब भी थे जिनका जवाब बस तुम्हारे पास था।कई बातें थी जो थी अधूरी तुम्हारे जाने के बाद।आज एक नयी आश लिए वे सभी मुझे इक अनोखे एहसास में सराबोर कर रही थी।झील की गहराई में उतरती चाँद की परछायी और सम्मोहीत करता तुम्हारे आने का एहसास।कई भाव संप्रेषित होकर जाना चाहते तुम्हारे पास और मानों यादों की पालकी पर बिठाकर ले आना चाहते मेरी जिंदगी में तुम्हें फिर से।हर एक पल जो कई सदियों सा गुजरा था अब मानों युग युग की प्यास को तरसता बस मेरे दहलीज में आकर कैद हो गया था।सब शीथिल,शांत और चुपचाप नजरें गड़ाये करते रहे तुम्हारा इंतजार।
हवाएँ मानों रुक गयी और चाँद भी बादलों के ओट से झाँकने लगा।झील अपनी खुशी कल कल की ध्वनि से प्रस्तुत करती और दिल की धड़कन धक धक,धक धक।पलकें अपलक सी बिना गिरे देखती रही और करती रही तुम्हारा इंतजार।किसी स्वप्न सुंदरी सी स्वर्णिम परिधानों में लिपटी आसमां के राहों से पुष्पविमान से आती तुम झील के बीचोंबीच रुक गयी और सम्पूर्ण धरती और अम्बर एक पल थम कर देखते रहे तुम्हें।मेरी साँसे महसूस करने लगी तुम्हारी उपस्थिती और जेहनोदिल में छाने लगी तुम।तुम्हारा सम्मोहन और प्रेममय अंदाज किसी इंद्रजाल सा मेरी धड़कनों की गति को और बढ़ाता रहा और एकाएक आँखे खुली सामने शांत झील और आसमां में चाँद।पर फिर भी एक आश की काश सच हो जाये आज ये एहसास तुम्हारे आने का।   

Saturday, April 16, 2011

तुम्हारे इंतजार की वो रात

चाँद गुमशुम,तारे खामोश और रात की आधी पहर का सन्नाटा और दिल की धड़कन का जोर-जोर से धड़कना,यादों की पालकी पर तेरी यादों का आना और ख्वाबों में तुमसे मिलने की आश लिए सोने की कोशिश करना।कभी चाँद को देखना,कभी तारों से भरी आकाश निहारना,बेवजह दिल को तसल्ली देना आज तो तुम आओगी।रात का पहर ढ़लता गया और मेरी आँखे तुम्हारे इंतजार में और भी जगी जगी सी रहने लगी।उन्हें लगता न जाने कब निंद आ जाये और तुमको देख ना पाऊँ आते हुए।सदियों से वो जो प्यास दिल में था कैद कही सुख ना जाये आँखों में आँसू बन के।
जैसे जैसे ये रात उदास होती गयी वैसे वैसे चाँद भी छुपता रहा मुझ दिवाने से।शायद वो जानता था कि वो तो बस कुछ घंटों में खो जायेगा पर ये दिल की सुनने वाला जागता रहेगा हरदम बस किसी के इंतजार में।कभी कोई मौन सा धुन मेरे कानों से टकरा जाता और कभी कोई आहट शायद कहती मुझसे तुम आ रही हो।ऐसे ही कुछ फासलों पे अक्सर लगता बस अब कुछ पल और फिर तो ये रात इंतजार की नहीं मिलन की रात होगी।


चाँद भी अब थक कर बादलों में खो गया,तारे भी मद्धम मद्धम से होने लगे पर हम अब भी बस नजरे गड़ाये करते रहे इंतजार तुम्हारा।तुमसे शायद यही करार था हमारे प्यार का।बस दर्द,उदासी और इंतजार इन्ही के संग तो जीने की आदत डाल रहा था मै तुमसे प्यार कर के।अकेला बिल्कुल अकेला हो गया मै।अब ना चाँद था ना तारे अब तो धिमे धिमे से रोशनी की पहली किरण आनी शुरु हो गयी थी।मै अभी भी बिल्कुल हतोत्साहीत ना था जानता था तुम तो आओगी ही।थोड़ी देर जो भी हो रही है शायद तुम्हारे आने में वो कही इस चाँद की तो कोई साजिश नहीं।कही तुम्हें देख अकेला वो अपनी चाँदनी समझ तुम्हें आवाज तो नहीं लगा बैठा।
पर प्रेयसी सुनो ना मै यहाँ हूँ न जाने कब से।कई रातों से यूँही तुम्हारे इंतजार में हूँ यहाँ।मै चाँद नहीं हूँ,मै रात नहीं हूँ,मै तो बस दिवाना हूँ तेरा जो अब रात और दिन में अंतर नहीं कर पा रहा तुमसे प्यार कर के।इंतजार की घड़ियाँ बस गिनता है उसे रात या दिन से क्या मतलब।ऊजाला हो या अँधेरा हो बस तुम्हारा इंतजार करता है।आवाज लगाता है,तुमको बुलाता है,और जब ना आती हो तो थक कर फिर निकल जाता है ढ़ुँढ़ने तुमको उस अजनबी रास्तें पर जहाँ पहली बार मिला था तुमसे।
हर रात कुछ खाश होती और तुम्हारे इंतजार की रात तो मानों जिंदगी के बारात की रात हो।कितनी खुशी,स्नेह और हर्ष से भर जाता है ह्रदय कैसे दिखाऊँ तुमको?मरने में भी जीने का मजा और जिंदगी के लिए इंतजार करना कितना कोमल एहसास था कैसे बताऊँ तुम्हें?वो रात भी अजीब था,पता नहीं मिलन की कल्पना से खुश था मन या विरह की अग्न में व्यथीत।पर मन की उत्सुकता तो तुम्हारे इंतजार को और भी विशेष रंग देता था।
तुम मत आना कभी।ऐसे ही हर रात मेरी जिंदगी में तुम्हारे इंतजार की रात होगी।और इक आश के संग जीता रहूँगा सारी उम्र।आज आओगी,कल आओगी,न जाने कब आओगी?पर सोचता हूँ जब तुम्हारे इंतजार में इतना मजा है तो तुमसे मिल कर तो शायद आनंद की प्रकाष्ठा ना पा लूँ।खुली आँखें क्या करे आँसूओं की धार ले आयी सहेज कर और बहने लगे सारे भाव दिल की आँखों से।हर बूँद पुकारता रहा तुम्हें और अब भी जिद करता रहा तुमसे मिलने की।ह्रदय अधीर होकर धड़कता रहा सारी रात और मन कभी इस पार,कभी उस पार होता रहा।एहसास होने लगा कि शायद अब तो  ये इंतजार ही जीने की वजह बन गयी और हम अब से हर रोज रात रात भर करते रहे तुम्हारा इंतजार।