Monday, April 4, 2011

उन रातों की बेसुधी

अरमानों को नजरअंदाज कर और भावनाओं को दिल में दफन कर इंसान ज्यादा दिन तक रह नहीं सकता।इसका एहसास होने लगा था मुझे।आज का दिन कुछ विशेष था मेरे लिए यूँ कहे जिंदगी में पहली बार जिंदगी से मुलाकात हो गयी थी।आज सारी दुनिया,सारे सपने और सारे अपने सब को भूल बस तुम्हीं में खो जाने को दिल करता था।बिन माँगे सब कुछ पा कर मै कुछ ज्यादा ही उत्साहीत हो गया था।कदम जमीन पड़ नहीं पड़ते थे।लगता था बस आसमां में उड़ रहा हूँ तुम्हारे अरमानों के पँख लगा कर।कोई भी गीत और संगीत अब दिल को भाता ही नहीं था।अब तो मै बस तुम्हारी मीठी बातों का दिवाना था।वे मीठी बातें जो मेरे प्यार भरे जीवन में इक अनोखे रस सा घुल रहे थे।
धीरे धीरे झुरमुट से झाँकता चाँद मानों तुम्हारा दीदार कर रहा हो,और कभी लगता मानों वो तुम ही हो,जो मुझसे शर्मा कर कभी कभी बादलों के आँचल में छुप जाती हो।इंतजार की वो रात,अपने प्यार की पहली रात कैसी थी बस महसूस कर रहा हूँ,कहने में असमर्थ हूँ।वो इक गीत मेरे कम्पयूटर में बजता रहता "चाँदनी की ना तो चाहत है,ना सितारों की जरुरत है...." और मानों इक अजीब सा माहौल पैदा कर देता वो तुम्हारे इंतजार का।आठ,नौ और दस बस घड़ियाँ बढ़ती जाती बहुत जल्दी जल्दी और मै चाह कर भी रोक ना पाता उस रात को।अब तो रात के बारह बज गये थे।चारों ओर खामोशी और सन्नाटे छा चुके थे।पर मेरे दिल के नगर में तो अजीब सी हलचल थी।तभी तुम्हारे कदमों की आहट सा मोबाईल का रिंगटोन फिर वही गीत बजा कर पुकारने लगा।धीरे से तुम्हारा बोलना "आप सो गये क्या" और मानों बस तुम्हारे इतना कहने पर मैने तो अपनी तमाम रातों की नींद ही सौंप दी तुमको।
कितनी बातें थी हमारे बीच कुछ समझ ही नहीं आता।ऐसा लगता कई सदियों से मैने कुछ ना कहा हो तुमसे और सारी बातें बस अब हो रही।तुम भी धीरे से कहती और मै भी धीरे धीरे अपने प्यार के उस अजनबी मँजिल तक पहुँचने की कोशिश करता।तभी मै तुमसे माँगता एक ऐसा शब्दों का उपहार जिसे सुनकर कोई भी प्रेमी जन्नत सा सुकुन पा ले और तुम बेवकूफ कुछ ना समझ पाती और बस बोलती रहती "क्या पता"।आखिर में हार कर जैसे ही मै तुम्हें बताने जाता उस अनोखे प्यार के उपहार के बारे में तुम कहती ठहरों मुझे पता चल गया और मै तुम्हारे विचारों के लिए प्रतीक्षारत रहता।कुछ देर बिल्कुल शांत हो जाती तुम।ना कुछ मै बोलता,ना कुछ तुम बोलती और फिर शरमाते हुए कहती "मै तुमसे प्यार करती हूँ"।मै सुन कर फिर से कहता क्या कहा तुमने फिर से कहो ना,कुछ सुनाई नहीं दिया और तुम गुस्सा के कहती हो गया मुझे अब नहीं बोलना।
तुम जानती थी मैने सुना था प्यार के उन शब्दों को।तुम्हारे इजहार को मैने कैद कर लिया था कही अपनी यादों के घरौंदे में।वो तुम्हारे शब्द मेरे लिए "पहली रात की वो आखिरी बात" बन गये थे,जिन्हें बड़ी दुर तक जाना था साथ मेरे।शायद तब तक,जब तुम ना हो वे शब्द मेरे हमराही मुझे इक हिम्मत देंगे जीने की।बातों में कुछ पता ना चला और खिड़की से ऊजाले की रोशनी कमरे में आने लगी और मैने तुमसे कहा भोर हो गयी शायद।पर अब भी लगता कहाँ हुई कुछ बात और खो जाते फिर सब को भूल हम अपनी बातों में।
पूरे दिन बेसुध से हम और रात भर तुम्हारी आहटों का इंतजार करते करते अब भी हम भोर तक जगते है।शायद ये सोच कर कि कभी तुम्हारा फोन आये और तुम कहो "अरे सुबह हो गयी,अब सो जाओ वरना तबीयत खराब हो जायेगी"।पर अब तो बस यादों के पन्नों में दिखता है मुझे उन तमाम रातों की बेसुधी का आलम।आँखों से नींद का दुर जाना और पलकों पे तुम्हारे ख्वाबों का  कुछ देर ठहर जाना अब भी कभी हँसाता और बेवजह ही रुला जाता है मुझे।उन रातों की बेसुधी अब भी शायद इंतजार करती है तुम्हारा और तुम्हारे फोन का........।

9 comments:

artijha said...

bhut acchha hai...fon ka intzaar kb tk krenge aap.....dil se likhi rachna hamesha ki tarh

शिखा कौशिक said...

prem ki gali ke utar chadhav ka bahut sundar varnan hai.kahi sach me to nahi ...?ha !ha ! .badhai

Udan Tashtari said...

उम्दा प्रवाहपूर्ण लेखन...बधाई.


नवसंवत्सर की शुभकामनाएं.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

भावनाओं का सुन्दर प्रस्तुतिकरण...
बधाई....

Sunil Kumar said...

सुन्दर प्रस्तुतिकरण,बधाई....

Dr Varsha Singh said...

बहुत ही सुन्दर पोस्ट....

सारा सच said...

nice कृपया comments देकर और follow करके सभी का होसला बदाए..

शिवकुमार ( शिवा) said...

सुन्दर प्रस्तुतिकरण..

सुशील बाकलीवाल said...

सलामत रहे दोस्ताना तुम्हारा...