Sunday, January 2, 2011

जीवन की परिभाषा‍...........(आत्मदर्शन)

वह जीवन जिसे हम ताउम्र जीते है।कभी हँसते है तो कभी वियोग में उसके रोते है।आखिर क्या है वो?जो ना होकर भी सबकुछ है,जो होकर भी कुछ नहीं है।जन्म,मृत्यु,उम्र,जवानी ये सब बस उस जीवन की कड़िया है,जिसके गुत्थे को सुलझाते कितने जीवन बीत गए।
                      "किसी को हमने एहसास कहा,किसी को भाव,                                                                                
                          पर जीवन क्या है बस दुख,सुख का छाव"।
                   "कभी जश्न है जहान में,कभी मातम का आलम है,                    
             जीवन को परिभाषित करना क्या किसी गूढ़ रहस्य से कम है"।
आज के भौतिकवादी युग में हम बस सुख,सुविधाओं और तबके को ही जीवन का लक्ष्य मान लेते है।पर क्या असलियत यही है?नश्वर तन का नाता बस बेजान नश्वर तत्वों से ही है।इस नश्वर तन के भीतर इक ऐसा प्रकाशित,अलौकिक आत्मरुप आत्मा जीवंत है,जो किसी कूपभवन में भी करोड़ों सूर्यों सा प्रकाशित है।आत्मा ही सनातन सत्य है और आत्मदर्शन ही जीवन का लक्ष्य।
कितनी सदियों से,कई युगों से विद्वानजन इस सत्य की खोज में अनवरत विद्यमान है,पर ये रहस्य बड़ा गूढ़ है।जीवन को परिभाषित करना खुद को जानना सा है।उस प्रश्न की खोज करना,जो कहता है "मै कौन हूँ?"
वो दुनिया में बड़ा प्रसिद्ध व्यक्ति है,कौन नहीं जानता उसे।बूढ़े,जवान को छोड़ों,बच्चों की जुबान पर भी नाम है उसका।पर क्या इतना प्रसिद्ध व्यक्ति ये जानता है,कि वो कौन है?पूछ लेना कभी थोड़े मोड़े भौतिक आडम्बरों में जकड़ा उसका जवाब खुद को परिभाषित कर लेगा।पर कब तक वो इस नश्वर तन के साथ,मिथ्या अस्तित्व और अल्पसमय हेतु परिचायक नाम के साथ जी पायेगा?कल के सफर में क्या पुकारेंगे उसे,तब तो खो जायेगा ना अस्तित्व हमारा
नाम क्या है?पहचान है हमारी,या अहम है हमारा,घमंड है हमारा।"मै" से खुद को परिभाषित करना ही मानव की सबसे बड़ी भूल है।क्योंकि जैसे कल कभी आता नहीं,बस आज ही बन जाता है।वैसे ही "मै" क्या है।मेरे लिए तुम्हारा "मै" तुम हो,उसके लिए वो है।हो गया न "मै" का पर्दाफाश।असलियत यही है,जीवन "मै" नहीं है,वो तो "हम" है।"हम" में मै हूँ,तुम हो,वो है,सब है।हमारी अच्छाईयाँ है,बुराईयाँ है।गलत है,सही है,सबकुछ है "हम" में।और "हम" ही जीवन है।
                          "जीवन की परिभाषा बस आत्मदर्शन है"।
जिसे जान कर एक साधारण मानव भी असाधारणता को पा सकता है।एक पशु भी देवत्व को छु सकता है।जीवन की परिभाषा अनंत है,जो अनंत रुपों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों का आत्मदर्शन है।मेरे लिए जीवन की परिभाषा बस एक प्रकार का "आत्मदर्शन" है,आपके लिए क्या है.............?

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

परिभाषा की प्रशंसा के लिए भाषा कम पड़ रही है!

Rahul Singh said...

कठिन डगर.

मनोज कुमार said...

अच्छे तरीक़े से परिभाषित किया आपने जीवन को। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
बड़ा ही जानलेवा है

ramlal upadhyay said...

गागर में सागर. . .