Wednesday, July 27, 2011

तुमने क्या मुझे याद किया है अभी

अभी-अभी मिली है खबर मुझे तुम्हारे ना होने का और मेरा वजूद कुछ क्षण बिल्कुल सन्न सा हो गया है यह जानकर कि अब तक बस तुम्हारे बिना जी रहा था वो।कुछ अलग हो गया है उससे।शायद कोई वजनदार चीज थी वो।जो कभी कभी कोमल दिल पर भी आघात कर देती थी।पर अब उसके जाने के बाद सब कुछ बेहतर है।अब वो भावनाओं की जमीन नहीं है,जिनपर प्यार की खेती होती थी कभी।पर अब बस मन के विस्तृत आकाश में कुछ यादों के बादल बचे हुये है।जो मेरी छत से ज्यादा दूर नहीं है।कभी कभी तो हाथों से ही हिला देता हूँ उनको और बरस बरस कर वे भींगो देते है मुझे बेमौसम ही अक्सर।
इन आँखों का खोजना न जाने कब पूरा होगा जब आराम से इन्हें मूँद सो सकूँगा मै।कभी तुम्हारे घर के बहुत करीब जाकर लौट आते है ये।शायद शर्म आती हो इन्हें।कही कोई देख ना ले।पर जब कभी भी खोजते खोजते थक जाते है तुम्हें सागर के किनारे जाकर अपनी कुछ मोतियाँ सौंप आते है उसे तुम्हारी यादों के सीप का।और इनकी अभिव्यक्ति की सार्थकता तब होती है जब तुम्हारी खामोश तस्वीर से दो बात कर लेते है आँखों ही आँखों में।कही यह पूछते है शायद "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी"।
अक्सर रात को जब प्यास लगती है मुझे और पानी पीने के बाद सरकती है तब लगता है कि हो ना हो पर जरुर तुमने याद किया है अभी।साँसों का अटकना तेज हो जाता है और ऐसा लगता है साँसों के कई विभाजनों में विभक्त हो कर रह गया है तुम्हारे यादों का हर एक मंजर।और कभी कभी बड़ी देर तक आती रहती है हिचकी सी।उसी क्षण भेजता हूँ मै तुम्हारे पास एक सवाल "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी"।और तुम्हारे जवाब की राह देखते देखते कब नींद आ जाती है पता ही नहीं चलता।नींद टूटने पर फिर महसूस होती है वही प्यास जिसने मन में कोई प्रश्न लाया था और तुम याद आ गयी थी फिर आज की रात।
जल रही है मद्धम सी प्रकाश कोणे में।बहुत अँधेरी रात है और मै अकेला चला जा रहा हूँ कही।शायद दीप लिये तुम ही खड़ी हो राह में क्या?जो मेरा इंतजार कर रही है और मै तो रौशनी की चकाचौंध में तुम्हारा चेहरा ही नहीं देख पा रहा।पर बस तुम्हारी दो घूरती आँखें दिख जाती है मुझे।उन्हीं आँखों से होकर उतरना है तुम्हारी धड़कनों में और आज खुद कैद हो जाना है तुम्हारी कम्पनों में।कभी कभी धड़कना भी है संग उनके और कभी तड़पना भी है याद में तुम्हारे।वैसा कोई निश्चित समय नहीं है जो हमारे द्वारा रखा गया था याद करने का और ना ही सीमित ही है सीमाएँ उसकी।पर अब भी तुम्हारी प्यास कुछ सीमित है,जो बस तुम्हारे आने से पूरी हो सकेगी।
बल्ब जल रही है दिवार पे अड़ी और पँखा चल रहा है छत से टँगा।उसका हर बार घुमना मेरी परिक्रमा को नया आयाम देता है और उसे एकटक देखता देखता मै कुछ पल पिछे हो आता हूँ कभी कभी।कभी कभी यह अनुभव सुख देता है पर कभी खुद पे ही गुस्सा आता है मुझे अपने पिछे जाने पर और पुरानी आलमारी में बँद फटे हुये कपड़ों सी तुम्हारी यादों को बार बार सीने से।पर नाइट बल्ब की मद्धम प्रकाश फिर सूचित करती है शांत हो जाने को।देर रात तक जागने की यह आदत सही नहीं है शायद तुम्हारे जाने के बाद।करकती ठंड में भी कम्बल में दुबका मै बस यही सोचता रहता कि काश ऐसा होता आज का दिन कुछ इस तरह आता कि सारे छाये हुये कुहासों को चीर देता वो।और धुँधली होती तुम्हारी छवि फिर मेरे अंतरमन में बस जाती आजीवन के लिए।और जीवन का गुजारा इस ख्वाब के संग हो जाता कि यह सच होगा एक दिन।महकती रहती अब भी मेरी हथेली जैसे मानों तुम्हारे चंदन से तन का स्पर्श कर लिया हो उन्होनें।
एक कसमकस सी है दबी अब भी दिल में कि "तुमने क्या मुझे याद किया है अभी" या यूँही आती है हिचकीयाँ मुझे।तुम याद करती हो शायद तभी तो हम भी हँसते है कभी वरना उदासी भरी राहों में कभी मुस्कुराहट होती ही नहीं।कल मिला था मै तुमसे वही अपने छत की बालकोनी में खड़ी तुम किसी का इंतजार कर रही थी।क्या वह इंतजार मेरे लिए था या यूँही मै खुद को तुम्हारा प्यार समझ बैठा था।पर यह मेरा सपना नहीं है कि तुम अब नहीं हो।यह सच है जिसपर चलता चलता मै बहुत मजबूत हो गया हूँ।चट्टानों सा कठोर हो गया है मेरा वजूद पर अब भी पत्थरों में तरासता है वो तुम्हारे कुछ अनकहे अक्षर जो लब्जों पे आकर न जाने कब से रुके हुये है।कुछ अजीब से एहसासों से भरे है वे जो ना मुझे चैन से हँसने देते है और ना रोने बस मौन रहने को कहते है।

8 comments:

vandan gupta said...

भीने भीने भावो की बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है सत्यम्…………बहुत पसन्द आई।

Shalini kaushik said...

ह्रदय के भावों को बहुत ही भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है सत्यम जी.बधाई सुन्दर अभिव्यक्ति हेतु.

Gopal Mishra said...

Hi Satyam, Kaafi achcha likhte hain aap. Appki Hindi ki tareef karni hogi.

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi badhiyaa

रेखा said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

Dr Varsha Singh said...

भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Manjula B Shah said...

Nice

Pls do visit my blog too for feedback


https://wazood.blogspot.in/