Saturday, June 18, 2011

प्रेमी चाँद की उलझन सा मेरा मन

हार कर आज आ बैठा मै अकेला छत पर।कितना पुकारा तुमको और तुम्हारे नाम को।अब तो शायद मेरे चारों ओर हर पल गूँजता रहता है नाम तुम्हारा प्रतिध्वनि बन कर।पर पता नहीं वो प्रतिध्वनि क्या तुमसे टकरा कर लौटती है या बस यूँ ही चली आती है मन को दिलासा दिलाने।आज मन में कई प्रश्न लिये और विरह की व्याकुलता से अधीर होकर विवश सा मन एकांत की तलाश में चाँदनी रात में छत पर ले आया मुझे।शायद आज पूछना था कई प्रश्न उसे चाँद और सितारों से या कही ढ़ूँढ़ता था अक्स तुम्हारा चाँद की प्रतिछाया में।क्या पता क्यों मन के सामने मजबूर ये प्रेमी अपनी प्रेम लगन के साथ आ बैठा आज छत पर अकेला।
आसमां में चाँद की चाँदनी से फुलझड़ियों सी जगमगाहट मानों मेरे मन में दुबक कर बैठे उस प्रेमी को प्रकाश का मार्ग दिखाती और ये दिलाशा भी देती की कही उस मार्ग में मिल जाये तुम्हारी प्रियतमा तुमको,जिसको ढ़ूँढ़ता आज तू यहाँ तक आया है।चाँद मुझे देख कर बादलों में छुपने लगा।शायद उसे अंदाजा था कि मेरे प्रश्नों के समक्ष वो भी इक प्रश्न सा बन जायेगा और उसके ह्रदय से भी उठने लगेंगे वो प्रश्न जो दबे-दबे से थे इन चाँदनी रातों में न जाने कब से।उसे एहसास होगा अपनी चाँदनी से विरह के हर उस क्षण का जब मै अपनी प्रियतमा के संग होता था और शायद मन ही मन जलता रहता था चाँद।उसकी जलन ही तो थी जो मुझे विरह के दिनों में बहुत खलती थी।तब वो मुस्कुराता था और मै अपने आँसू पोंछता बस एकटक देखता रहता उसको।पर आज वो भी तन्हा है और मै भी अकेला।
यह चाँदनी रात न जाने यादों के कितने बंद दरवाजे पर दस्तक दे गया।और यादों के किसी महल में आज भी सम्भाल कर रखी हुई तुम्हारी यादें झाँकने लगी बाहर।भूल गया मै अपना प्रश्न जो मुझे पूछना था आज चाँद से मै तो अतीत की गहराईयों में ही गोते लगाता रहा।तुम्हारे साथ का एहसास ही कुछ ऐसा खुशनुमा था कि उनके संग ही सारी उम्र गुजारने को जी करता था।एकाएक चाँद का मुझको निहारना मानों जगा गया मुझे यादों की उस स्वप्न निद्रा से और फिर मन में उभरने लगे कई प्रश्न जो चाँद से करने थे।पहले मैने ईशारा किया उसको और मुस्कुराते हुए एक ही बार में कहता चला गया अपने दिल की सारी बात।मैने कहाँ "ऐ चाँद! मै जानता हूँ तेरी चाँदनी पहुँचती होगी वहाँ भी जहाँ मेरी प्रियतमा शायद अभी भी यादों के संग खेल रही होगी और अपने सिरहाने को आँसूओं से भिगोकर रो रही होगी।।क्या तू मेरा एक पैगाम उस तक पहुँचा सकता है कि मै भी न जाने कब से राह देख रहा हूँ उस साथी का जिसके साथ के बिना जीवन बिल्कुल अधूरा सा लगता है।"
कुछ पल बिल्कुल शांत और स्थिर सा चाँद शायद कुछ सोचता रहा और फिर कहने लगा "हाँ मै तुम्हारे इस पैगाम को तुम्हारी प्रियतमा तक पहुँचाउँगा पर तेरे दिल के दर्द और विरह को कैसे बतलाउँगा?मानता हूँ मेरी चाँदनी है पहुँचती हर उस जगह पर जहाँ मै बस ठहर कर देखता हूँ,छू नहीं पाता।पर आज भी है दूर मुझसे मेरी चाँदनी।तू तो है बहुत दूर सनम से पर मै तो साथ रहकर भी,देखकर भी छू नहीं सकता उसको,प्यार नहीं कर सकता उसको।"चाँद की इस उलझन को सुन दिल में मानों भावनाओं का कोई ज्वार सा उठने लगा जो छुना चाहता था चाँद की चाँदनी को और सौंपना चाहता था चाँद को उसकी प्रियतमा।पता न था आज छत पे चाँद से पूछा गया मेरा प्रश्न खुद मुझे मौन कर जायेगा और अपनी प्रियतमा को भूल कर चाँद की चाँदनी को ही ढ़ूँढ़ता रह जाऊँगा आजीवन।
लगा ऐसा कि मेरी हथेली पर टपक कर आँसूओं की बूँद आ रही है जो शायद विरह के आशिक उस चाँद की है।जो देखता है,निहारता है अपनी प्रिया को पर दिल की उलझने दिल में ही सीमट कर रह जाती है।बेचारा शर्मीला कह भी नहीं पाता दिल की बात।अब पता चला उन दिनों जब मै साथ होता था अपनी जिन्दगी के क्यों जलता रहता था ये चाँद।शायद उस जलन में छुपी हुई थी प्यास अधूरी अपनी प्रियतमा को पाने की।दुनिया के सभी प्रेमियों को उनका प्यार सौंप कर भी आज ये चाँद और चाँदनी क्यों इतने दूर है खुद से।क्या दूर से ही प्रेम का अमिट स्पर्श छू जाता है उनके दिलों को और शायद ये दूरी करती है इस अनोखे प्यार को पूरी।

Sunday, June 12, 2011

कभी तुम मेरी इन धड़कनों की फिक्र भी कर लिया करो

याद आने लगा आज सदियों बाद फिर से वो दिन जब तुमसे नहीं मिला था,ना हुई थी बात अपनी,ना थी कोई जान पहचान तुमसे।पर ये दिल ना जाने क्यों तुमको अपना मान बैठा था।तुमसे जब पहली बार बात हुई थी अजीब हालत थी इन धड़कनों की।मुझसे ज्यादा अधीर तो बेचारे ये ही हो रहे थे।धड़कती रहती थी हर पल धड़कन रुकने का नाम ही नहीं लेती और  इक अद्भूत आनंद सा समाता जाता था मेरी इन धड़कनों में।जिन्दगी में पहली बार अधीरता भी कुछ ऐसा खुशनुमा माहौल पैदा कर रही थी जिसमें सब कुछ स्थिर था।बस दिल की धड़कन ही चल रही थी कभी हौले हौले तो कभी जोर से।
इन धड़कनों में कैद है आज भी उस पहले दिन से आखिरी दिन तक की हर एक तुम्हारी साँस जिनको मेरी साँसों ने बस महसूस किया था।इन धड़कनों की अधीरता तो बस बेबाक थी दौड़ते रहते थे मीलों तक और मै स्थिर बस स्थिर कुछ सोचता रहता।कई बार जब तुमसे प्यार का इजहार करना चाहा था मै,इन धड़कनों की वजह से ही रुक गया था।डरता था कही मेरी इन धड़कनों के प्रवाह का किसी को पता न चल जाये।ऐसे ही कही भी,कभी भी जब तुम्हारा नाम अनायास ही टकरा जाता था मेरे होंठों से फिर तो देखते ही बनती थी इन धड़कनों की बेचैनी।


एक बार तुमने रख दिया था हाथ मेरी इन धड़कनों पर और बेचारे गुमशुम से ये भी ना कह सके कि वो तो हर पल बस धड़कते है तुम्हारी खातिर।शायद उस पल धड़कनों का वेग जो तेज हो गया था वो तुम्हें कुछ कहना चाहते थे।पर निःशब्द भावों को नहीं समझ पायी तुम।क्यों तुम्हारे पास होने पर तेज हो जाते है ये और जब तुम्हारे जाने का समय आता है,तो फिर वही धक धक।पर शायद तुम्हें नहीं थी परवाह इन धड़कनों की जिनके धक धक की हर झंकार में बस तुम्हें पाने की इक अधूरी प्यास सी बजती थी,जिसे बस मै ही सुन पाता था,तुम नहीं।क्या तुम्हें महसूस नहीं होता था प्रवाह इन धड़कनों का जब तुम इनको छुती थी।
होंठों की सक्रियता और आँखों की बेचैनी तो समझ पाती थी तुम पर भावनाओं के उस दबे आशिक इन धड़कनों की फिक्र क्यों ना थी तुम्हें?ऐसा लगता ये धड़कन जल्दी जल्दी से किसी मँजिल तक पहुँचना चाहते है दौड़ कर पर मेरी विवशता के सामने वो भी विवश है।तुम्हारे ना होने पर थोड़े शांत रहते थे वो पर ज्योंही ख्यालों की जमीन पर उतर आती थी तुम धीरे से ये संवेदनाओं की अलौकिक रेस में जुट जाते थे।ख्वाब में आज भी तुम्हें सामने देख कर इन धड़कनों को शायद अब भी तुम्हारे आने का इंतजार है।
अब शायद सब कुछ रुक सा गया है तुम्हारे जाने के बाद पर आज भी न जाने किसकी खातिर ये धड़कते रहते है।शायद आज भी विश्वास है इन धड़कनों का तुम पर या इनका वो साझा जो इन्होनें तुम्हारी धड़कनों से किया था इन्हें अब भी देता है प्रवाह धड़कने का।शायद जिन्दगी के अंतिम क्षणों में जब साँस छुटने की बारी आये तब भी ये पागल धड़कन माँग ले कुछ वक्त और धड़कने को तुम्हारी खातिर।न जाने कैसा महसूस करते है ये बेवजह धड़क कर ये तो मुझे भी नहीं पता पर सच में इन धड़कनों की बदौलत ही आज भी तुम जिन्दा हो मेरी यादों की भूली बिसरी कहानी में।आज भी इन धड़कनों का फिक्र करने वाला शायद नहीं है कोई पर महसूस करने वाला तो है न।
तुमसे दूर होकर हर बार मैने महसूस किया है वो खालीपन जो तुम्हारे संग होने पर कितना भरा भरा सा होता था,जो मेरी साँसों को इक नयी जीवन उर्जा देता था।कई बार दुखाया दिल मैने तुम्हारा पर हर बार मेरा दिल समझा लेता था तुम्हारे दिल को और वो बंधन जो शायद अटूट है हमारे प्यार का जुड़ जाता था फिर से।पर इस बार तुम्हारे जाने के बाद क्या कहूँ बड़ी जोर जोर से धड़कते है ये धड़कन पर इन धड़कनों को कहाँ मालूम की कोई फिक्र ही नहीं उसे जिसकी खातिर बेवजह धड़के जा रहे है ये।कितना भी धड़क ले ये पर वो बिछुड़ा साथी अब कहाँ आने वाला जो शांत कर सके इन धड़कनों को और बस एक बार हाथ रख कर इनपर करा दे ये एहसास इनके फिक्र का।

Sunday, June 5, 2011

क्यूँ आकर फिर चली गई तुम?

सच में कुछ बदलाव तो था इस बार की अपनी मुलाकात में।इस बार वो इंतजार न था और ना था वो प्यार जो मै तुमसे करता था।शायद मुझे भी आभास हो रहा था इसका पर पता नहीं क्यों वो एहसास फिर धड़कनों में समा ही नहीं पा रहा था।वो खुमारी जो झलकती थी मेरी आँखों से और मेरे दिल के धड़कनों के संग धड़कती रहती थी और जो मुझे दिवाना बनाती थी तुम्हारे प्यार का।अब मेरे जेहनोदिल में उतरती ही न थी।कुछ ऊबा ऊबा सा मै तुम्हारे बातों का जवाब देता और तुमसे बात कर ऐसा लगता कि अपने प्यार पर कोई एहसान कर रहा हूँ।
फिर रात होती वैसी ही चाँदनी और दिलकश जैसा हुआ करती थी कभी जब प्यार के मदहोश पलों में खोये रहते थे हम।आँखों में ना नींद होता और ना अपनी बातें कभी खत्म होने का नाम लेती।पर इस बार तो नींद से मानों मुहब्बत हो गई थी मुझे तुम्हारे न होने के दिनों में।बड़ी जल्दी मै सो जाता और तुम बस इंतजार करती रहती।मै वही हूँ,तुम वही हो पर शायद प्यार का तजुर्बा जरा बदल गया है।वो प्यार जो कभी नई रंगत लेकर आया था मेरी जिंदगी में आज बोझ सा महसूस हो रहा था।और उस बोझ तले दबा दबा सा मेरा प्यार फिर जुदाई का डर दे देता था कभी कभी।


पता था मुझे एक दिन फिर तुम चली जाओगी मुझसे काफी दूर और फिर चाह कर भी बुला ना पाऊँगा तुम्हें।किस अधिकार से आवाज दूँगा तुम्हें।क्या कहूँगा आओ फिर से एक एहसान कर दो खुद पे।तुम मुझसे इतना प्यार करती थी पर शायद मै प्यार के काबिल ही ना था।कई बार तुमने पूछा "क्या कारण है इस बदलाव का" और मै बस यही कहता "सब तो वैसा ही है,कहाँ कुछ बदला" और कोशिश करता अपनी असमर्थता को छुपाने की।
तुमने कहाँ कि शायद अब तक तुम प्यार को जान ही नहीं पाये हो,आज तक जो था वो बस आकर्षण था प्यार नहीं।और मै मौन रह कर शायद हामी भरता तुम्हारे इस बात पर।कभी जब तुम ना होती तो सोचता क्या सच में आज तक मुझे प्यार नहीं हुआ,अब तक जो हुआ वो बस आकर्षण था।फिर सोचता आखिर प्यार कैसा होता है?याद आता वो पहला मुलाकात,वो पहली बार जो हुई थी तुमसे बात।कितना खुश था मै कदम जमीन पर पड़ते ही न थे।लगता था कि सारी दुनिया अब बस मेरे दामन में सीमट आयी है।शायद वो प्यार के कुछ पलों को जीने की ईच्छा दे गया था मुझे उस पहली बात में और प्यार के झोंको ने मुझे बहा लिया था खुद में।


तुम आई तो ऐसा लगा सदियों से थमी मेरी साँस मानों फिर से चलने लगी हो,ऐसा लगा फिर से जीने का एक बहाना मिल गया हो।जिसे ढ़ुँढ़ता ढ़ुँढ़ता कई बार मै मौत की गलियों से घुम आया था तुम्हारे न होने पर।रात फिर हसीन होने लगी और और तारों ने गुफ्तगु करना चाहा पर मेरे दिवानेपन को देख सभी शर्मा गये और चाँद भी अपनी चाँदनी की सारी छटाये हमारे प्यार पर फैलाता रहा।छत पर मै और तुम एक दूसरे के सामने निहारते रहे अपने प्यार को और यादों के हर एक बीते पन्नों को पलट पलट कर मै तुम्हें दिखाता रहा गुजरी मुहब्बत की बातें।
पर आज क्यूँ फिर चली गई तुम बहुत दूर।उतनी दूर जहाँ तक ना मेरी आवाज जाती है और ना मेरी नजर।ढ़ुँढ़ता रहा कई रात यूँही अकेला छत पर तुम्हें।चाँद से पूछता क्या देखा तुमने उसे,पर वो मौन रह कर शायद ये कहता वो तो आज भी तेरे साथ है पर "तू ही बदल गया है रे!" देख एक बार फिर प्यार की नजरों से वो तेरे सामने ही है।और मै शायद अपनी ही भूल के बदले फिर खो देता तुम्हें।फिर जिन्दगी मायूस होकर पूछती तुमसे "क्यूँ आकर फिर चली गई तुम" और मै बेबश होकर अब इंतजार भी ना कर पाता,क्योंकि खो दिया था मैने वो अधिकार भी इस बार।

Monday, May 30, 2011

जन्म दर जन्म भूल गया सब कुछ

विराट अथाह समुद्र के बीच में खड़ा मै।जहाँ चारों ओर बस दृश्य होता जलमंडल का कभी ना अंत होने वाला छोड़।पवन अपने वेग में समेट कर लाती संदेश इस जलमग्नता का और प्राणश्वासों की विलुप्तता का।अंधकार का सम्राज्य और भी भयावह बना देता इस सम्पूर्ण परिदृश्य को और इक लकड़ी के छोटे नामात्र टुकड़े पर अड़ा मेरा अस्तित्व मुझे मेरी तुच्छता का बोध कराता रहता।जीवन पथ का यह मार्ग कभी संकीर्ण कंदराओं से गुजरता तो कभी विस्तृत जलमंडल से।जहाँ मार्ग में आलोकित करता मेरा राह एक प्रकाश पुन्ज चाँद सा हर दम मेरे साथ चलता।एक क्षण को बुझ जाता हर दीप मन का पर ये चाँद प्रतिक्षण मेरे साथ होता।
भूलने की ये कहानी मुझे समझ ना आती और भूलता रहता जन्म दर जन्म अपनी सारी जन्मगाथाएँ।भूल जाता सारे रिश्ते जिन्हें सहेजते अपनी कितनी जन्मों की भावनाओं को दावँ पे रखता था मै और अपना सर्वस्व समर्पित करने के बाद भी कुछ और देने की इच्छा रहती थी मन में।उस ममता को भी भूल गया और उस ममतामयी काया को भी।जन्म दर जन्म ममतामयी काया का स्वरुप बदलता रहा और मै भूल गया अपनी बीती सभी जननियों को भी।


जीवन का सत्य जन्म और मृत्यु,जन्म में आनंद की महक और मृत्यु में जुदाई की कसक।इन सभी सांसारिक लक्षणों से मुक्त होकर मै आज आया हूँ  यहाँ।जानता हूँ कोई नहीं है यहाँ जो मेरा है,पता है कुछ नहीं है अपना जिसपर अधिकार जता सकता हूँ।पर ये तो बता दो मेरे परमपिता!"तुम कहाँ हो?"तुममे मिलना ही मेरी सम्पूर्णता है।तुम्हारे दर्शन ही मेरे नैनों की नैन पुतलियों की रौशनी है,जिनमें रिक्त है अब तक तुम्हारी प्रतिमूर्ति की छाया।अब तक बस बदलता रहा स्वरुप तुम्हारे कांतिमय काया का पर प्रभू आज इन नैनों की जिद के आगे विवश हूँ।वो तो बस तुम्हारे प्रकाश पुन्ज के प्रकाश से ही प्रकाशित होंगे वरना इन आँखों की रौशनी तो खो ही जायेगी।
नभ की ओर हाथों को फैलाकर,चारों दिशाओं को एक संग आधार बनाकर आज करना है तुम्हारा आह्वाहन।अंतर्मन से पुकारना है तुम्हें और लहु की हर बूँद का कतरा कतरा भी न्योछावर कर आज तुम्हारे वास्ते मर मिटना है।पता नहीं ये मेरी भक्ति है या समर्पण की शक्ति है पर ऐसा लगता है आओगे तुम।तुम्हारे आने पर नभ से सुगंधित पुष्पों की वृष्टि होगी।धरा खुशहाल होकर स्वागत गीत गायेगा और जलमंडल अपने खारे जल को विशुद्ध पावन बना कर तुम्हारे पावँ पखारने निकल पड़ेगा।सभी जीव,प्राणि तुम्हारे आगमन की उत्सुकता से ऐसा कोलाहल मचायेंगे जो एक संगीतमय वातावरण निर्मित करेगा।मेरा अस्तित्व जरा तुच्छ सा होगा इन विराट ब्रह्मांड के नायकों के समक्ष पर प्रभू जिसके दर्शन को सब नैन बिछायेंगे उसको तो मै अपने मन के मंदिर में ही देख लूँगा आँखें बंद कर।जिससे मिलने सम्पूर्ण संसार आगे बढ़ेगा उसे तो मै बस मन के नगर में एक कदम उतर कर ही पा लूँगा।
वास्तविक जीवन के वास्तविक परिचायक मेरे प्रभू तुम चिर काल से चिर काल तक मेरे पालक और संरक्षक हो।माँ-बाप,भाई-बहन अन्य सारे रिश्ते बस क्षणिक है,जिनके अस्तित्व को ताउम्र महसूस कर सकना संभव है पर जन्म दर जन्म याद रखना असम्भव।जन्म दर जन्म भूलता गया हर बात जिस बात में मै था,तुम थे और शायद कभी हम सब थे।भूल गया वो जगह जहाँ कभी मै और तुम हँसते थे,रोते थे और कई बार जागते और फिर सोते थे।बस याद रहा वो राह और राह में आलोकित वो प्रकाश पुन्ज,जो शायद तुम ही हो मेरे प्रभू।

Thursday, May 26, 2011

नई जिन्दगी की एक नयी सुबह

शंकाओं से भरी हुई वो सुबह,अनिश्चिताओं के हजारों किरणों को खुद में समेटे जगाता रहा मुझे।पुरानी जिन्दगी यादों के पन्नों में सीमट गयी और नयी जिन्दगी भविष्य के सपनों को कही दूर मुझे दिखाती दे गयी एक भोर।इस सुबह कोई ना था।सब अजनबी थे मेरे आसपास।बस अकेला मै और मेरी बदली हुई नयी जिन्दगी,जिसमें आशाओं के बादल हल्के हल्के घिर जाते थे कभी और एक नयी शुरुआत का आस्वासन दे जाते थे मुझे।कभी कोई शोर कानों से टकरा जाता और कभी कोई विचार मोड़ देता राह मेरी जिन्दगी का।
सोचता मै बैठा बैठा क्या संघर्ष की शुरुआत होने वाली है या संघर्ष का ही दूसरा स्वरुप है यह आया हुआ सुबह।इस भोर में बहुत कुछ नयापन है,उजड़े हुये स्वप्न घरौंदे है जिन्हें चुन चुन कर फिर से बनाना है मुझे अपने सुनहरे भविष्य का कल।लड़ना है मुझे रिश्तों की डोर के हर एक उस एहसास से जो कमजोर करता है मुझे।समझना है नये रंग और रुप को और खुद को भी रंग लेना है उस रंग में।देखना है आकाश की उन ऊँचाईयों को जो मेरे घर के छत से काफी दूर है।पाना है हर उस मुकाम को जो इस नयी दुनिया में बड़ा दिखायेंगे मुझे।


कल्पनाओं की मेरी नगरी से बिल्कुल अलग सा है यह नया संसार।भावनाओं की कमी और इंसानियत का थोड़ा अभाव है यहाँ।संवेदनाओं को रौंद कर ही शायद मिलती है यहाँ पहचान और पैसों के बिस्तर पर ही शायद पाते है सभी सुकुन यहाँ।कभी सोचता शायद ये दुनिया मेरे लिए नहीं,मेरे लिए तो वो पुरानी दुनिया ही भली थी।पर फिर जब पिछे मुड़ कर देखता तो दूर दूर तक बस खाली खाली सा नजर आता।शायद छुट गया काफी पिछे वो बचपन का जमाना कही किसी स्मृति में।अब तो एक जिम्मेवार व्यक्ति बन कर नई दुनिया की नागरिकता हासिल करनी है मुझे।
सारे शौक और मेरे सारे हसरत दम तोड़ते रहे,चिल्लाते रहे पर जिन्दगी के भागदौड़ में भागता भागता मै शायद बड़ी दूर निकल आया था।बस एक बार भी पिछे मुड़ कर देखने की फुरसत कहाँ थी अब तो।अब ना थी वो शाम की तन्हाईयाँ जिसमें चुपचाप एकांत में चलता मै मीलों की दूरी तय करता।खुद से बातें करता और अपने दिल की भी सुनता।ना था वो सुनहरा सुबह जब सबसे पहले उठकर सूर्यनमस्कार करता और फिर योग और ध्यान।अब तो बस मेरा वजूद किसी का गुलाम था।पहले तो एक दिन में कई काम होते थे मेरे,पर अब मेरा पूरा दिन बस किसी एक काम को ही करते करते गुजर जाता।


हाँ,एक बात थी इस नयी जिंदगी में बड़ी चैन की नींद नसीब होती थी पर यहाँ भी सपने तोड़ देते थे मेरी खुशियाँ और मेरी जिम्मेवारी फिर जगा देती थी मुझे।दुनिया तो था कहने को नया,पर जिन्दगी में कुछ भी ना था नया।बस रेस जो कभी खत्म ही नहीं होती।रोज सुबह,रोज शाम और फिर वही बेचैन की नींद जो चैन सी लगती।कभी ये जिंदगी ना देती समय सोचने को कुछ बस कहती बढ़ते जाओ।
एक एक कर टुट गया हर ख्वाब,दफन हो गयी मेरी सारी ख्वाहिशे और जलता रहा मेरे सपनों का वो घर जिसकी नींव मैने चैन के उस हर रात में रखी थी जब कल्पनाओं का आकाश ही मेरा छत था और मेरे विचार उनपे टिमटिमाते तारों से थे जो मेरी जिन्दगी के हर रात को जगमग जगमग करते थे।पर शायद इस नयी दुनिया में महत्व नहीं है मेरे विचारों और मेरी कल्पनाकाश का।यहाँ शायद मेरी भावनाओं की भी कद्र नहीं है जो अक्सर मुझे बहुत ही बड़ा स्थान दिलाते थे कभी पर अब यही मेरी कमजोरी से बन गये है।मेरी नयी जिन्दगी की एक नयी सुबह का यह सुबह शायद पहला और आखिरी ही है मेरे लिए।

Monday, May 16, 2011

"वक्त ने मुझे बड़ा बना दिया-पापा"

अपने सभी अरमानों को दबा लिया दिल में ही कही और किसी से ना कुछ कहा।कई ख्बाव जो पलते थे आपकी आँखों में दिन-रात उसे आपने मेरी आँखों को सौंप दिया।क्यों किया ऐसा आपने,बस मेरे लिए ना पापा!आप हरदम बस सोचते रहे हमारी खुशी के लिए और मै कुछ ना समझा आपके प्यार को।वो आपका प्यार ही तो था जो मुझसे बार-बार बातें कर मेरे बारे में पूछना और कुछ ज्यादा ना कह पाना।मेरे उज्जवल भविष्य के लिए दिन रात यहाँ से वहाँ आपका भाग-दौड़,कुछ ना समझ पाया मै।
बचपन से किताबों में पढ़ता आया माँ की ममता के बारे में।माँ की ममतामयी छाया में भूल गया शायद कि एक ऐसा दिल भी है,जो बहुत प्यार करता है मुझसे।आज जीवन के मायने बदल रहे है शायद अब मै बड़ा हो गया हूँ।उतना बड़ा की अब अपने जीवन के बारे में गम्भीरता से सोच सकूँ।मेरे लिए जीवन के कई रुप है परिवार,दोस्त,प्यार और कैरियर बहुत कुछ है।पर एक शख्स जिसकी हर आहट में मेरे कदमों का ही चिन्ह झलक जाता है,वो शख्स बस आप है पापा।जो बस मेरे लिए सोचते है,मुझसे बहुत प्यार करते है।पर शायद मै आपके इस प्यार की छतरी ओढ़े खुद को न जाने क्या समझ बैठता हूँ।अपने अस्तित्व की पहचान को ही गुमनाम कर बैठता हूँ।
आपका बार-बार कहना बेटा इस बार घर आना ऐसा प्रोग्राम है और मै तो अकड़ कर ही रह जाता।शायद क्या सोच लेता मै।समझ ना पाता क्यों जब बस एक हफ्ते ही हुये होते मेरे घर से आये आप मुझे फिर उसी उत्साह के साथ बुलाते।और इस अनोखे प्यार को तो मै अपनी सफलता का अवरोध मान लेता।शायद उस रोज जब मै सफलता की ऊँचाईयों को छू रहा होउँगा,यह निमंत्रण और प्यार फिर से पाने की इक अधूरी ख्वाहिश दिल में जगेगी।पर शायद समय कुछ बदल सा गया होगा उस वक्त।


कहा गया है कि "चीजों की कीमत मिलने से पहले और इंसान की कीमत खोने के बाद पता चलती है"।आँसू भी बरबस आँखों में तब आते है,जब आँसू पोंछने वाला बड़ी दूर जा चुका होता है।इंसान सोचता है समय को पकड़ लूँ अपने तो संग है ही पर शायद ये समय ही सभी अपनों को भी किसी भोर के सपने सा बना देता है।जिसके टुटने पर दिल को बहुत दुख होता है,क्योंकि भोर का सपना शायद भविष्य का सच होने वाला होता है।नहीं पता मुझे ये क्या है जिसके कारण जब आप सामने होते है तो कुछ ना कह पाता हूँ और ना दिखला पाता हूँ।पर एहसास बाद में कचोटने लगते है मन को और ऐसे ही जब बिल्कुल अकेला हो जाता हूँ,तो अपने उस परिवार की याद आ जाती है,जहाँ सब को मेरी चिंता रहती है,बस मेरी।
पूरी दुनिया में शायद बहुत कम लोग ही ऐसे है जो सोचते है मेरे बारे में।मेरी खुशियों में मेरे साथ होते है और मेरे दुख में छुप-छुप कर आँसू बहाते है।शायद समय उस दहलीज पे भी लाकर खड़ा कर दे एक दिन जब कोई गुमान ना हो खुद पे।वो जिद ना हो,वो चाहत ना हो और ना हो वो फरमाईश।जो मै अक्सर करता था आपसे और आप झट से पुरा कर देते थे उसे।कभी ये ना सोचते थे क्या गलत है और क्या सही,बस मेरे लाडले की खुशी है,सब ठीक है।


कभी कभी जो आपका दिल दुखा देता हूँ पापा बहुत अच्छा लगता है।खुश होता हूँ मै ये सोचकर कि आपको तो मेरी भावनाओं की कद्र ही नहीं।पर अब तक असमर्थ हूँ आपके भावनाओं को देख पाने में जिसमें कुछ नहीं है,कोई चाहत नहीं जीवन के उड़ानों का उसमें तो बस मेरी तस्वीर है बचपन से अब तक की।यादें है वो जो शायद अब याद नहीं आते।मेरी हर एक फरमाईश और ख्वाहिश से भरी हुई है आपकी भावनायें।जिसे मैने अपने जीवन में स्नेह का अभाव मान लिया था,वो तो बस मेरे प्रति स्नेह के अगाध पुष्पों से सजा हुआ है।आपकी वो बात "बेटे,मेरे जाने के बाद मेरी बहुत याद आयेगी तुम्हें देखना!"आज आपकी कोई कही हुई बात नहीं बस एहसास है जो अब भी उस काँधे को तरसता है जहाँ से देखता था मै सारी दुनिया।अब भी उन ऊँगलियों को पकड़ना चाहता है,जिसे थाम कर खुद को सबसे खुशनसीब समझता था।वो डाँट आपकी जिसे सुन बहुत बुरा लगता था,फिर सुनना चाहता हूँ।
जिन्दगी में जिस छावँ के तले पलता हुआ बचपन से अपनी जवानी गुजार दी वो छावँ ही अब मुझे जलन देता है,तपाता है मुझे और मेरे शरीर को और उसे छोड़ काफी दूर निकल जाता हूँ मै।वक्त के पहियों पर दिन-ब-दिन गुजरता रहता है हर पल और अपनी सभी ईच्छाओं को दफन करता जाता हूँ दिल में कही।वो बातें जो बिना आपसे कहे सार्थकता नहीं पाते थे,अब तो बस जुबान से दिल में ही दबे दबे रह जाते है।शायद अब जरुरत नहीं मुझे उस काँधे की,उन ऊँगलियों की जो अब भी बुलाते है मुझे रोज।अब तो मै खुद ही खड़ा-खड़ा देख लेता हूँ सारी दुनिया।


ऐसा लगता है "वक्त ने मुझे बड़ा बना दिया है-पापा"।शायद उतना बड़ा जहाँ से बस लम्बी-लम्बी ईमारते दिखती है।बस सितारों की रौनक दिखती है,पर वो दिल की चाहत नहीं दिखती जो अब भी गले से लगाने को बेकरार है मुझे।जो इतना बड़ा होने पर भी मुझे आज उतना ही छोटा समझता है जितना मै था कल तक।अब भी भीड़ में मै ढ़ुँढ़ता हूँ उस शख्स को जिसकी आँखों में मेरे लिए बस प्यार ही प्यार है।यकीनन वो मेरे पापा ही है,जो आज भी मेरी आँखों से देखते है मुझे और कभी-कभी जो ठोकर लगती है,गिरने को होता हूँ तो थाम लेते है मुझको।और मै कितना भी बड़ा होकर फिर से छोटा बहुत छोटा हो जाता हूँ उनके सामने.....। 

Wednesday, May 11, 2011

अब तो तुम हो साथ मेरे

हरी हरी घासों पे लेटा,खुले आसमान के निचे संसर्ग की उन्मादकता का स्वागत करता मै।तुम्हारी नीली आँखों में गगन की सारी उड़ानों को ढ़ुँढ़ता और तुम्हारे स्पर्श से मेरे रोम रोम में हर्ष की इक नयी कली का मानों प्रस्फुटन होता।तुम्हारे साथ होने का ये आभास कही कोई कोरी कल्पना तो नहीं।खुद को विश्वास दिलाने के लिए बार बार मेरा तुमको किया गया स्पर्श इन मिलन के क्षणों का मूकदर्शक बन जाता।आँखे मूँद कर आज मन के दर्पण को पूर्णतः साफ कर बीते सभी पुराने अतीत की यादों को पोंछ देता और उस दर्पण से साफ साफ देखता सुनहरे भविष्य के आने वाले हर एक पल को जिसमें तुम्हारे साथ मै जिन्दगी के हर एक अधूरे ख्वाबों को गढ़ता जिन्हें पूरा करना अब मेरी जिन्दगी का एकमात्र लक्ष्य था।
सुबह सुबह चिड़ीयों का चहचहाना,कई मिन्नतों के बाद तुमको फिर से पाना और मन की बेसुध बाँसुरी से निकलता वो राग पुराना।सब के सब मिलन के इन क्षणों को एक अलौकिक स्वरुप देते और मेरा प्यार चुपचाप दिल के किसी कोणे से कुछ कहना चाहता।शायद तुम्हें अब साथ देखकर कुछ डर सा हो रहा था उसे क्योंकि जुदाई के हर एक दर्दभरे कल को उसने अपने अस्तित्व की संरचना का एक हिस्सा मान छुपा लिया था खुदमें।उसने ही बस महसूस किया था तुम्हारे विरह की अग्नज्वाल का जिसमें जलता जलता वो अब तो बेरस सा हो गया था।मिलन और जुदाई दोनों एक सा ही लगता था उसे पर आज तुम्हें देख फिर से मानों पा लिया उसने अपना खोया अस्तित्व।
लवों पे आते कितने बात और कितने बात दिल में ही दबे दबे घुटते रहते।पर हम तो कुछ ना कहते अब बस देखते रहते तुमको।तुम्हारे चेहरे पे आयी वो स्वर्णमयी स्याह लकीरें मेरे अंतरमन के सुसुप्त तारों को एकाएक झंकृत करती और तुम्हारे संग का एहसास बुझा देता मेरे मन के प्यास को जो न जाने कितनी सदियों से,कई युगों से तुम्हारे आने की आश लिए जी रहा था।तुम पूछती "क्या तुम्हें याद नहीं अपने प्यार की वो तमाम रातें"?और मै बेचारा कैसे बताता कि उन रातों की यादों के संग ही तो जी रहा था अब तक।तुम्हें क्या पता उन बिते हर एक रातों में तुम ना होकर भी मेरे कितने पास होती थी और मेरा प्यार कैसे तड़पता था तुम क्या जानों।मै तुमसे कहता "तुम्हें याद है सब"।तो तुम बस इतना कहती "हाँ हर एक बात और तुम्हारे प्यार का साथ सब याद है मुझे,कभी नहीं भूल सकती मै"।
आसमां से उतरता कोई फरिश्ता अपने हाथों में दुनिया की सारी खुशियाँ लेकर आता और धिरे से हमारी झोली में रख चला जाता।मै कुछ कदम बढ़ाता तुम्हारी ओर और तुम अब बिल्कुल करीब होती मेरे।माहौल में फूलों की सौरभता सा बिखर जाता यादों का हर एक मंजर जिसमें मिलन और विरह दोनों का समावेश होता।यादों का आईना चकनाचूर हो जाता और हर एक टुकड़े में कही तुम्हारे साथ और कही खुद को अकेला देखता मै।फिर रात आती और थोड़ी बदली बदली सी रंगत के संग एहसास दिलाती कि "अब तो तुम हो साथ मेरे"।
दूर दूर तक कुछ ना दिखता अपने प्यार के सिवा और राहों में बिछा होता सुनहरे प्रेम के प्रणय गीतों में सराबोर तुम्हारे संग का रंगीन चादर।फूल बिछे होते चाँदनी रातों में जब मै तुमसे फिर करता अपने प्यार की दो बातें और तुम बिना कुछ सुने कहती "मुझे तुमसे इतना प्यार क्यों है जानां?"हर पल बस तुम्हारे बारे में सोचती और हर दिन तुमसे मिलने की चाहत लिए दरवाजे पर निगाहें गड़ाये क्यों करती हूँ तुम्हारा इंतजार।और मै बस यही कह पाता "शायद ये प्यार अब कुछ विशेष है,जो विरह की अग्नज्वाल में तप तप कर स्नेह और अनुराग का मिश्रित स्वरुप बन कर प्रेम की प्रकाष्ठा का आलोप है।"इस विशिष्ट प्यार का ही तो परिणाम है कि एक बार फिर तुम हो साथ मेरे।

Tuesday, May 3, 2011

जीवन के वीरान राहों में फिर तुम्हारा साथ चाहिए....

वो राह जीवन का जिसपर हम हमेशा साथ होते थे।मीलों साथ चलते और कुछ ना कहते थे।बस तुम्हारे साथ की खुशी ही तो मुझे लम्बे फासलों के दर्द को भी महसूस नहीं होने देती।रास्ते चलते,हम चलते और समय भी भागता रहता अपनी रफ्तार से बस थमी होती तो ये दिल की धड़कन।लगता ऐसा कि काश यूँही सफर चलता रहता और ना होती कभी भी शहर इस रात की।इस रात में हमदोनों बैठे होते चुपचाप एक दूसरे के सामने और पूछते दिल से दिल की बात।घंटों मौन रहने की आदत जो पहले ना थी मुझमें पर तुमने सीखाया था अपने जाने के बाद।कितने अधूरे और अप्रकाशित ख्वाब मेरे अब भी शायद दिल के किसी कोणे में पड़े इंतजार कर रहे थे स्वयं के पूरे होने का।
प्रिया! क्या तुम भूल गयी वो सारी बातें जो मैने बस तुमसे कहने के लिए सुंदर शब्दों में पिरोकर कागज के टुकड़ों पर बार बार लिखता और मिटाता दिन भर बनाता रहता और रात को तुमसे कहने की कोशिश में घंटों यूँही बिता देता।क्या ये शर्म थी मेरी या ह्रदय की अधीरता जो मै तुम्हें वो कभी ना कह पाता जिसे कहना शायद जरुरी था तुमसे।असंख्य शब्दों के शब्दकोश से बस दो चार गिने चुने ही शब्द चुन पाता जिसे तुम्हारी उपमा से अलंकृत करता।पर फिर भी मेरी विवशता न जाने क्या थी जो उन गिने चुने शब्दों में से भी बस कुछ शब्द ही कह पाता।शायद तुम्हारी उपमा के भाव से परे थे वो शब्द या मेरे लब्जों पे आके संकुचित हो जाते थे वे।वो दूर तक तुम्हारे साथ जाने के लिए मेरा दौड़ा दौड़ा आना और बस तुम्हारे पास आकर इतना कहना "क्या चलोगी तुम साथ मेरे"।इन शब्दों से मै पूछता था क्या वीरान जीवन के इस खामोश सफर में मेरा साथ दोगी तुम।इजहार प्यार का कर तो देता पर शायद तुम मेरे इस अंदाज को समझ ना पाती और बस इस पेड़ से उस पेड़ तक जाती और कहती "हो गया ना"।
यादों के पत्तें अब भी झरते रहते है उस पेड़ से जहाँ से तुम चलती थी साथ मेरे।और मेरी विवशता पे हँसते है वे सारे मौसम जिन्होनें देखा था मुझे साथ तुम्हारे सदियों से सदियों तक।मेरा तुम्हारे साथ चलते जाना और मँजिल पर आकर ये एहसास होना सफर तो खत्म हो गया।कई रोज उन वीरान राहों पे आहटे तुम्हारी आती थी मुझे लगता था कि आज फिर तुम साथ चलोगी मेरे इस पेड़ से उस पेड़ तक।पता है शायद जिन्दगी अब इस पेड़ से उस पेड़ तक ही सीमट के रह गयी है और प्यार के हर एक किस्से मानों इन राहों में ही खुद को ढ़ुँढ़ते फिर रहे हो।वे किस्से जो ना तो कभी कहे मैने तुमसे और ना ही सुना तुमने कभी।वो बस दिल की दहलीज से झाँक कर यादों के मौसम को देख लेते है कभी कभी और अपनी दास्ता बयां करते है खुद ब खुद मेरे दिल में।तुम्हारे साथ की कल्पना में हर पल गुजरे कल में रहना ही आज मेरी पहचान है,शायद वो भूत ही मेरा वर्तमान है।
पतझड़,बसंत और न जाने कितने मौसम ने कई बार मुझे भींगाया है,वो राह भी भींग जाता है और वो दोनों पेड़ जहाँ से चलकर जहाँ तक चलती थी तुम साथ मेरे वो भी अपने पत्तों के संग भींगते रहते है।पतझड़ के बाद नये पत्तें मानों भविष्य की रुपरेखा गढ़ते है और बिखरे हुए सूखे एक पत्तें को सम्भाल कर रख लेता हूँ मै अपने पास।उस एहसास को जो मुझे तुम्हारे साथ होने का झूठा दिलासा दिलाता है और भींग भींग कर पेड़ के सारे पत्तें मेरे अंतर्मन को भी कभी भींगो जाते है।आँखों से कभी बरस लेते है यादों के मोतियों को लुटाते और कभी हँस कर अपना गम भी छुपा लेते है सबसे।अब भी राह देखता है वो सूखता पेड़ शायद तुम्हारे स्पर्श का,अब भी वो राहें सूनसान ही रहती है शायद तुम्हारे बिना।बस एक बार ही उन राहों को आबाद कर दो तुम और वीरान राहों में फिर एक बार मेरे साथ चलो ना इस पेड़ से उस पेड़ तक।आज भी लगता है कि शायद मुझे जीवन के वीरान राहों में फिर तुम्हारा साथ चाहिए।

Monday, April 25, 2011

एहसास तुम्हारे आने का



कितनी सुंदर लग रही है आज ये सारी छटायें,जो कल तक बेरंग थी मेरे लिए।साँझ की लालिमा में लिपटा बितता पहर आज अपने किसी पुराने साथी सा जान पड़ा जो अब मुझे अकेला नहीं देख पाया और अपनी मद्धम साँझ की लालिमा में यादों के संग समेटता गया मुझे।ये बदलाव शायद इसलिए था कि मुझे तुम्हारी आहटों का पता चल गया था।मै जान गया था कि तुम फिर आ रही हो मेरे पास बस मेरे प्यार की खातिर।उसी झील के किनारे जाकर कई घंटे निहारता रहा उसकी चुप्पी और खामोशी को।ये वही जगह था जहाँ हम कई घंटे बस यूँही बातें करते थे और एक दूसरे की नजर में अपने लिए कितना प्यार है जानने की कोशिश करते थे।तुम पूछती थी "कितना प्यार करते हो मुझसे?" और मै बाहें फैला कर आसमां को उनमें समेटने की कोशिश करता और बताता कि इस अनंत आसमां की चादर भी जहाँ तक सीमित हो जाये,उससे भी आगे तक कई गुणा प्यार करता हूँ तुमको।
आज वो झील फिर से मानों मेरी नजरों में आ बसा है।तुम्हारी परछाई कही झील में दिखती और तुम्हारे आने के एहसास से मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठता।विरह की उन सारी रातों को जिसे बस मैने महसूस किया था,वेदना के उन सारे क्षणों को जिसमें बस खुद ही खुद में बड़बड़ाता कितनी बातें कही थी तुमसे याद कर रहा था मै।तुमसे ये कहूँगा,तुमसे वो पूछूँगा,फिर सोचता क्या कहूँगा तुमसे "तुम तो भूल गयी थी ना मुझे,तुम्हें पता था कि मुझे कितनी याद आती थी तुम्हारी?"कभी सोचता बस देखता रहूँगा तुमको,कही नहीं जाने दूँगा।अगर तुम होगी सामने तुमसे खुब सारी बातें करुँगा और तुम्हारे पहलू में आज खुब रोऊँगा।मेरी आँखों में समाये उस झील का प्रतिबिम्ब आज बरसेगा,नहीं रोकूँगा मै।बस बरसने दूँगा।
फिर यही सब सोचता खोता गया मै पुरानी यादों में और वे यादें मेरे भविष्य की कल्पना गढ़ती रही।सोचता कि कही ऐसा न हो तुम मुझे पहचान ही ना पाओ,तो मै तुम्हें फिर वही गीत सुनाऊँगा जो बहुत अच्छा लगता था तुम्हें।तब तो शायद मेरी आवाज से पहचान ही लोगी तुम और अगर फिर भी ना पहचानी तो वो सारी तकियाकलाम जो मै कहता था और तुम दूहराती थी,उनका सहारा लूँगा।याद है तुमने कहा था,मेरा ये कहना "बोलो ना!"बहुत पसंद था तुम्हें।पर तुम्हारे जाने के बाद हर रोज इन पेड़ों से,आसमां से,झील से और रात को चाँद से बस यही कहता था मै "बोलो ना!"।पर तुम तो शायद सुनती ही ना थी मुझे।
तुम्हारे आने की आश इक नयी जिंदगी की सौगात लेकर आया मेरे लिए।वो जिंदगी जिसने मुझे प्रेरणा दी मेरे खुद के होने का।जिस प्रेम के अस्तित्व ने मेरे मिटते अस्तित्व को एक नयी जिंदगी की नींव दी थी।आज उदासी के हर उन क्षणों के निष्कर्ष का पल था,जो मिला था मुझे तुमसे तुम्हारे जाने के बाद।कई प्रश्न मेरे होंठों पर अब भी थे जिनका जवाब बस तुम्हारे पास था।कई बातें थी जो थी अधूरी तुम्हारे जाने के बाद।आज एक नयी आश लिए वे सभी मुझे इक अनोखे एहसास में सराबोर कर रही थी।झील की गहराई में उतरती चाँद की परछायी और सम्मोहीत करता तुम्हारे आने का एहसास।कई भाव संप्रेषित होकर जाना चाहते तुम्हारे पास और मानों यादों की पालकी पर बिठाकर ले आना चाहते मेरी जिंदगी में तुम्हें फिर से।हर एक पल जो कई सदियों सा गुजरा था अब मानों युग युग की प्यास को तरसता बस मेरे दहलीज में आकर कैद हो गया था।सब शीथिल,शांत और चुपचाप नजरें गड़ाये करते रहे तुम्हारा इंतजार।
हवाएँ मानों रुक गयी और चाँद भी बादलों के ओट से झाँकने लगा।झील अपनी खुशी कल कल की ध्वनि से प्रस्तुत करती और दिल की धड़कन धक धक,धक धक।पलकें अपलक सी बिना गिरे देखती रही और करती रही तुम्हारा इंतजार।किसी स्वप्न सुंदरी सी स्वर्णिम परिधानों में लिपटी आसमां के राहों से पुष्पविमान से आती तुम झील के बीचोंबीच रुक गयी और सम्पूर्ण धरती और अम्बर एक पल थम कर देखते रहे तुम्हें।मेरी साँसे महसूस करने लगी तुम्हारी उपस्थिती और जेहनोदिल में छाने लगी तुम।तुम्हारा सम्मोहन और प्रेममय अंदाज किसी इंद्रजाल सा मेरी धड़कनों की गति को और बढ़ाता रहा और एकाएक आँखे खुली सामने शांत झील और आसमां में चाँद।पर फिर भी एक आश की काश सच हो जाये आज ये एहसास तुम्हारे आने का।   

Saturday, April 16, 2011

तुम्हारे इंतजार की वो रात

चाँद गुमशुम,तारे खामोश और रात की आधी पहर का सन्नाटा और दिल की धड़कन का जोर-जोर से धड़कना,यादों की पालकी पर तेरी यादों का आना और ख्वाबों में तुमसे मिलने की आश लिए सोने की कोशिश करना।कभी चाँद को देखना,कभी तारों से भरी आकाश निहारना,बेवजह दिल को तसल्ली देना आज तो तुम आओगी।रात का पहर ढ़लता गया और मेरी आँखे तुम्हारे इंतजार में और भी जगी जगी सी रहने लगी।उन्हें लगता न जाने कब निंद आ जाये और तुमको देख ना पाऊँ आते हुए।सदियों से वो जो प्यास दिल में था कैद कही सुख ना जाये आँखों में आँसू बन के।
जैसे जैसे ये रात उदास होती गयी वैसे वैसे चाँद भी छुपता रहा मुझ दिवाने से।शायद वो जानता था कि वो तो बस कुछ घंटों में खो जायेगा पर ये दिल की सुनने वाला जागता रहेगा हरदम बस किसी के इंतजार में।कभी कोई मौन सा धुन मेरे कानों से टकरा जाता और कभी कोई आहट शायद कहती मुझसे तुम आ रही हो।ऐसे ही कुछ फासलों पे अक्सर लगता बस अब कुछ पल और फिर तो ये रात इंतजार की नहीं मिलन की रात होगी।


चाँद भी अब थक कर बादलों में खो गया,तारे भी मद्धम मद्धम से होने लगे पर हम अब भी बस नजरे गड़ाये करते रहे इंतजार तुम्हारा।तुमसे शायद यही करार था हमारे प्यार का।बस दर्द,उदासी और इंतजार इन्ही के संग तो जीने की आदत डाल रहा था मै तुमसे प्यार कर के।अकेला बिल्कुल अकेला हो गया मै।अब ना चाँद था ना तारे अब तो धिमे धिमे से रोशनी की पहली किरण आनी शुरु हो गयी थी।मै अभी भी बिल्कुल हतोत्साहीत ना था जानता था तुम तो आओगी ही।थोड़ी देर जो भी हो रही है शायद तुम्हारे आने में वो कही इस चाँद की तो कोई साजिश नहीं।कही तुम्हें देख अकेला वो अपनी चाँदनी समझ तुम्हें आवाज तो नहीं लगा बैठा।
पर प्रेयसी सुनो ना मै यहाँ हूँ न जाने कब से।कई रातों से यूँही तुम्हारे इंतजार में हूँ यहाँ।मै चाँद नहीं हूँ,मै रात नहीं हूँ,मै तो बस दिवाना हूँ तेरा जो अब रात और दिन में अंतर नहीं कर पा रहा तुमसे प्यार कर के।इंतजार की घड़ियाँ बस गिनता है उसे रात या दिन से क्या मतलब।ऊजाला हो या अँधेरा हो बस तुम्हारा इंतजार करता है।आवाज लगाता है,तुमको बुलाता है,और जब ना आती हो तो थक कर फिर निकल जाता है ढ़ुँढ़ने तुमको उस अजनबी रास्तें पर जहाँ पहली बार मिला था तुमसे।
हर रात कुछ खाश होती और तुम्हारे इंतजार की रात तो मानों जिंदगी के बारात की रात हो।कितनी खुशी,स्नेह और हर्ष से भर जाता है ह्रदय कैसे दिखाऊँ तुमको?मरने में भी जीने का मजा और जिंदगी के लिए इंतजार करना कितना कोमल एहसास था कैसे बताऊँ तुम्हें?वो रात भी अजीब था,पता नहीं मिलन की कल्पना से खुश था मन या विरह की अग्न में व्यथीत।पर मन की उत्सुकता तो तुम्हारे इंतजार को और भी विशेष रंग देता था।
तुम मत आना कभी।ऐसे ही हर रात मेरी जिंदगी में तुम्हारे इंतजार की रात होगी।और इक आश के संग जीता रहूँगा सारी उम्र।आज आओगी,कल आओगी,न जाने कब आओगी?पर सोचता हूँ जब तुम्हारे इंतजार में इतना मजा है तो तुमसे मिल कर तो शायद आनंद की प्रकाष्ठा ना पा लूँ।खुली आँखें क्या करे आँसूओं की धार ले आयी सहेज कर और बहने लगे सारे भाव दिल की आँखों से।हर बूँद पुकारता रहा तुम्हें और अब भी जिद करता रहा तुमसे मिलने की।ह्रदय अधीर होकर धड़कता रहा सारी रात और मन कभी इस पार,कभी उस पार होता रहा।एहसास होने लगा कि शायद अब तो  ये इंतजार ही जीने की वजह बन गयी और हम अब से हर रोज रात रात भर करते रहे तुम्हारा इंतजार।

Sunday, April 10, 2011

दिल ने तो बस दिल की सुनी

काश दिल पे थोड़ा जोर होता और तुम्हें पाने की चाहत ही ना करता कभी।ये जानते हुए कि तुम नहीं हो मेरी और ना ही कभी बनोगी मेरी।कहा है तुमपे मेरा थोड़ा सा भी अधिकार,जो तुमसे पूछ लेता क्या मेरी भावनायें नहीं दिखती कभी तुम्हें।ये वही भावनायें है,जो मुझे तुम्हारी तरफ खींचता और सम्मोहीत करता है मुझे तुम्हारी चाहत की खातिर।ये वही भावनायें है,जो कभी बिल्कुल अकेला कर देता है और कभी तुम्हारी यादों की महफिल में ला छोड़ता है मुझे।
कई दिनों से दिल की ये उधेड़बुन क्या करुँ?ना रातों को चैन,ना दिन को आराम।बस होंठों पे आ जाता है तेरा नाम।ऐसा लगता जैसे कोई नहीं है अब साथ मेरे।बिल्कुल तन्हा अकेला बस तुम्हारे इंतजार की आश के संग जगता।सोचता कह दूँगा आज तुमसे अपने दिल की बदमाशी,जो न जाने कब से छुपाये बैठा है ये अपने अंदर।सोचता आज पूछ लूँगा तुमसे क्यों तड़पाती हो इतना,बेवजह बिना आहट के मेरे सपनों में आकर क्यों हर रात तंग करती हो मुझे?फिर सोचता तुमको क्या पता ये मेरी कहानी,ये तो मैने खुद बनाया है।खुद प्यार करता हूँ तुमसे और खुद बुला लाता हूँ तुम्हें अपनी यादों में और अपने सपनों में।
हिम्मत से आज तुमसे कहने आ रहा हूँ मै अपनी दिल की बात जो अब बड़ा दर्द देता है मुझे।वीरान राहों में अक्सर तुम्हारे ख्यालों में ला छोड़ता है।आज नहीं जरुरत थी किसी भी भूमिका की आज तो दिवानेपन की शाम थी।आज नहीं था कोई भय प्रतिकार का,आज तो बस दिल की ही सुननी थी।कुछ सोचता कभी और एक कदम पीछे हट जाता पर दिल की आवाज मुझे तुम्हारे पास लाकर खड़ा कर देता।बेचारा दिल भी आखिर दिल के वास्ते मजबूर हो जाता और परिणाम की चिंता छोड़ इजहारे मुहब्बत कर देता तुमसे।


अब थोड़ा सा चैन मिल जाता दिल को पर असमंजस की वो स्थिती जो अब आने वाली थी अंदर तक झकझोरती रहती।क्या तुम मेरा साथ दोगी या इस बेसहारे को और अकेला छोड़ दोगी अपने खुद के हाल पे?पहले तुम पूछती ये क्या कह दिया तुमने और फिर गुमशुम हो जाती।तुम्हारी ये खामोशि कौन सा जवाब था,क्या समझ पाता मै।शायद मेरी उदासी के पहर की शुरुआत का पल था वो,जब तुमने मेरी भावनाओं को रौंद कर मेरे दिल पे जख्मों का वार कर प्यार का प्रतिकार किया।ठुकरा दिया तुमने बस एक पल में मेरी हर चाहत को और दिल के आँसूओं के सैलाब में कई रात यूँही बहता रहा ये दिल बेचारा।
किस कसूर की सजा पा रहा था ये दिल,ये तो शायद दिल को भी ना पता था।बस अब भी तुम्हारे प्यार के दो आँसूओं को सम्भाले तुम्हारे प्यार की कयामत का इंतजार करता।उस कयामत का इंतजार जो तोड़ देता दिल को दिल ही दिल में और अफसोस भी ना कर पाता दिल,दिल ही दिल में।आखिर दिल ने तो बस दिल की सुनी।वो कहा जान पाया तुम्हारे दिला का हाल।उसने आज भी यूँही बसा कर रखा है तुम्हारी वो यादों की तस्वीर दिल में।मानता हूँ तुम नहीं हो मेरी पर दिल तो बस दिल तक पहुँच ही जाता है कभी कभी यादों की पुल बना कर।
ना कोई अफसोस और ना कोई शिकवा तुमसे।बस इक इच्छा दिल की तुमसे दूर जाने की।शायद खुशियाँ लौट आये जीवन में तुम्हारे मेरे दूर जाने के बाद।तुम खुश रहो,मुस्कुराती रहो और बस हरदम अच्छी रहो।यही तो है मेरे दिल की चाहत जो कभी मैने कह दिया था तुमसे।सब समझते है,कि तुमने तो ठुकरा दिया था मेरे प्यार को पर तुम्हारे जीवन की हर एक मुस्कान ही तो मेरे प्यार के स्वीकार्य आमंत्रण का परिणाम है।उस वक्त दिल ने तो बस दिल की सुनी और बस तुम्हारे बिना जीवन में है एक कमी।ना जाने क्यों सब पाकर भी दिल की वो बगिया मेरी अब भी है सूनी सूनी।  

Monday, March 21, 2011

आज फिर उदासी है तुम बिन

सब तो है आज मेरे साथ,सारी खुशी है मेरे पास,फिर क्यों है इतनी उदासी?बिल्कुल उदास जीवन निरसता का मानों पर्याय बना गया हो।तुम बिन वो चीज जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी,अब नहीं अच्छी लगती।कुछ भी तो नहीं भाता तुम बिन।बस एक तन्हाई ही साथी सा है मेरा अब,जो अपनी झोली में मेरी खातिर उदासीयाँ भर लाता है।अकेला मै और न जाने कहाँ अकेली तुम।अब तो कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हें मेरी उदासी या खुशी से।अब तो भूल गई हो तुम सब कुछ।
हर शाम यादों को लाती और न चाहते हुये भी उदासी मुझे घेर लेती।बिल्कुल अकेला खड़ा मै अपने जीवन के वीरान राहों पे बड़ा उदास हो जाता।आँखे कभी कभी ढ़ुँढ़ती तुम्हें यहाँ वहाँ पर फिर बेचारी थक कर सो जाती।सुबह से रात तक कितने ख्वाब संजोता मै परन्तु फिर रात का डरावना ख्वाब सब चकनाचूर कर देता।चाहता मै कुछ प्रणय गीत लिखूँ आज पर क्या करुँ उदासी भरे नगमें ही बना पाता।चाहता आज लिखूँ उस क्षण के बारे में जब तुम मिली थी मुझे पहली बार,पर हर बार वो आखिरी रात ही याद आता मुझे और उदास जिंदगी की तन्हा राहों पर फिर अकेला बेसुध सा मै चल पड़ता ढ़ुँढ़ने तुम्हें।
इक कमी जिसके पूरे होने का स्वप्न मै रोज देखता,पता है वो तुम्हारा अभाव ही है मेरे जीवन में।बहुत सी बातें कहने को जी में आता,पर कहाँ आती हो तुम अब पास उन्हें सुनने।मै अब कैसा हूँ,जानती हो,क्या कोई परवाह नहीं तुम्हें?पर कभी तो बड़ी चिंता होती थी तुम्हें मेरी खातिर।पर क्या अब जमाना बदल गया इतनी जल्दी।तुम कहती मुझसे अपने दिल की बात और मै तुम्हें ढ़ाँढ़स बँधाता।अब क्या कोई बात तुम्हारे दिल में नहीं पलते या मुझसे कहना अच्छा नहीं लगता।
कभी कभी अजनबी बनने की तुम्हारी कोशिश हर बार हमे और करीब लाती और आज क्यों इतने करीब होकर भी हम एक दूसरे को पहचान नहीं पा रहे।कुछ तो है तुम्हारे दिल में जो मुझसे कहना चाहती हो अब भी तुम।पर मेरी उदासी तो मानों मुझे बिल्कुल अकेला और एकाकी बना दिया है।अब खुद से पूछता,खुद पे हँसता और कभी कभी पागलों की तरह तुमसे बात भी कर लेता।इक झुठी तसल्ली दे देता दिल को पर फिर उदासी अपना दामन फैला कर समेट लेती मुझे खुद में।


साँसे तो चलती रहती पर ऐसा लगता अब भी धड़कन तुम्हारे दिल में ही धड़क रही हो।क्योंकि काबू नहीं रह पाता अपनी धड़कनों पर।तुम बिन कई सदियाँ यूँही उदास बीत जाती,कितने मौसम यूँही तपाते,बरसते और मुझे कई बार भींगा के चले जाते।तुम बिन बस इक तुम्हारी ही तमन्ना जीवन का लक्ष्य होती और आखिरी साँस में भी तुमसे मिलने की झुठी ख्वाहिश करती।
तुम नहीं आती,न मै ही तुमसे मिल पाता और बस इक उदास जिंदगी में तन्हाईयों से ही दोस्ती करने की कोशिश करता।तुमको उन उदास पलों में कभी छत पे अकेली खड़ी देख तुम्हारे पास जाता और फिर तुम गुम हो जाती।कभी तुम्हें उस झील के किनारे बैठा देखता और आँखों में मेरे इंतजार की बेचैनी तुम्हारे लाख छुपाने पर भी झलक जाती।कभी तुम्हें अपनी उदास जिंदगी में हर उन राहों पे खड़ी देखता जहाँ मेरा अकेलापन मुझे बिल्कुल अधीर बना देता और तुम्हारा साथ जीवन का सच्चा साथी होता।तु्म्हारे इंतजार में फिर भोर होती और फिर रात को बिस्तर पर कई घंटे बस तु्म्हारे बारे में सोचता रहता और फिर वही पुरानी उदासी घेर लेती मुझे चारों तरफ से और मै अकेला बिल्कुल अकेला हो जाता सब के बीच तुम बिन।  

Thursday, March 17, 2011

बस यूँ ही

शायद तुम्हे है पता कि मै "बस यूँ ही" नहीं लिखता।शायद तुम जान सकती हो मुझे और समझ सकती हो,कि हमारा वजूद "बस यूँ ही" नहीं है।इन आसान से लब्जों से कई बार तुमने अपने दिल में उमरते तूफान को छुपा लिया था,कई बार आँखों ही आँखों में सूख गयी थी आँसूओं की वो बरसात।और तुमने ये कह कर हर बार टाल दिया था मुझे "बस यूँ ही"।घर के कोणे वाले उस कमरे में छुप छुप कर तुम क्या करती थी?आँसूओं को यूँ ही बहाती और यादों के हर एक लम्हें को जीती रहती।
बस कुछ पल का साथ ही तुम्हारा "बस यूँ ही" सारी जिंदगी का हमसफर माँगता था मुझसे पर मेरी असमर्थता को शायद ही कोई समझे।मै चाहता कर दूँ अपनी तमाम जिंदगी बस तुम्हारे नाम।हर साँस के हर पोर में बस समा जाओ तुम और नजरों से जहाँ तक देख सकूँ मै,बस तुम्ही दिख जाओ।कितनी बातें करुँ तुमसे पर वो जो कुछ अनकही है हमारे बीच वो कैसे बयां हो पाये?कहने से भला कह सकता दिल की बात तो कब का कह दिया होता,पर उन बेजुबान लब्जों को शब्द देना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल था।कभी ऐसा लगता मेरी ईशारों में मेरा इजहार तुम तक पहुँच गया है,पर फिर नादान दिल की बेचैनी लब्जों पे आकर ही टीक जाती और मै गुमशुम सा सोचता रहता क्या करुँ?


मजबूरियों में बँधे हम दोनों,अपनी मजबूरी की दास्ता बयां भी नहीं कर पाते और भावनाओं के खेल में उलझे उलझे "बस यूँ ही" गमों के सैलाब में कभी कभी डुबकी लगा लेते।तुमसे मै पूछता क्यों तुमको इतना ख्याल है मेरा,क्यों तुम मुझसे बातें करती हो और जानती हो तुम कि मै ना आऊँगा कभी,फिर भी इंतजार करती हो मेरा।और तुम तो बस एक शब्द कहती "बस यूँ ही" और सच में "बस यूँ ही" जिंदगी से मुलाकात हो जाती हमारी उस रोज।
तुमको ऐसे पाने की चाहत और तेरी खातिर बस जख्मी दिल को राहत।एहसास कराता मुझे शायद तुम हो कही साथ मेरे।ऐसा लगता कि कोई बड़ा पुराना नाता है तुमसे,जो मुझे बार बार खिंच कर लाता है तुम्हारे पास वरना दो पल की बातचीत कभी भी जिंदगी की कहानी सी नहीं लगती।मेरी भावनायें तुम समझ जाती बिन कहे और तुम्हारी भावनाओं को मै महसूस करता और जब दिल पूछता आखिर ये क्या है,तो धीरे से कह देते उससे "बस यूँ ही"।तुम "बस यूँ ही" बस जाती मेरे जेहनोदिल में और इतेफाक से ही इक नयी दुनिया के हमसाये से बन जाते हम दोनों।
अपनी भावनाओं पर काबू पाना शायद तुमने ही सिखलाया था मुझे और आज जब मै दूर जा रहा हूँ तुमसे तो कहती हो "वापस आ जाओ ना"।भला क्यों आऊँ मै तुम्हारे पास,जबकि जानता हूँ कुछ नहीं है हमारे बीच वो तो "बस यूँ ही" है।तुम जानती हो ये जो बात है ना "बस यूँ ही" बिल्कुल वैसा ही है,जैसे हम किसी संवेदना को महसूस करते है पर देख नहीं पाते।नहीं होता पता हमे उसके पीछे का सच।क्या सम्मोहन होता इन बातों में वो तो बस वो ही जान पाता,जो बार बार दुहराता इन शब्दों को।
मै जानता हूँ बेवजह ही तुम इंतजार कर रही होगी मेरा "बस यूँ ही"।पर जानती हो मै सच कहूँ ये इंतजार बड़ा प्यारा होता है।तुम्हारे बिन तुम्हारी यादों के सायों के संग जीना तो बड़ा ही खुबसुरत एहसास होता है।चलो कोई बात नहीं हम नहीं है आपके पर बस इक गुजारिश है इस पागल दिल की "बस यूँ ही" बेवजह ही मिलती रहना तुम हर रोज,ताकि जिस जिंदगी को छोड़ के बड़ी दूर जाना चाहता था मै।"बस यूँ ही" उसे पाने की इक झूठी तमन्ना दिल में पालता रहूँ सारी उम्र।  

Wednesday, March 9, 2011

अब भी कुछ बाकी है शायद

मेरे खुद के अंतरमन में उलझे हुये मेरे सवाल अब मानों खुद ही अपने जवाब से विमुख होकर,एक संशय सा बन गये है।मौन,खामोशि और चुप्पी ये जो बिल्कुल शांत और गम्भीर भाव है,अब मुझे बेवजह ही चिल्लाने को मजबूर कर रहे है।वेदना और अंतरमन की पीड़ा का मिश्रित स्वरुप न चाहते हुए भी आँसू बन कर जगजाहिर होना चाहते है।अपने आप पर भी तो विश्वास ना रहा,तो भला इन आँसूओं का क्या पता कब ये राज-ए-दिल खोल दे।और सदियों से जो जख्म दफन था मेरी धड़कनों में,जिसका वजूद मेरे अस्तित्व की सम्पूर्णता का बोध कराता था और जो दर्द मुझे हर पल जीने की एक नयी प्रेरणा देता था।वो जख्म फिर से यादों की पोटली में सना एक घाव बन कर मेरे सामने आ जाये।
मैने सीखाया था तुम्हें प्यार करना पर खुद शायद प्यार निभाना सीख ना पाया।बादलों की गोद में मेरा प्यार चाँद सा अठखेलियाँ लेता मानों लुकछीप का कोई खेल,खेल रहा हो मेरे साथ।कभी तुम्हारी आँखों मे अपना चेहरा देखता और कभी तुम्हारी नजरों से खुद को देखने की कोशिश करता।बड़े मजबूर और असहाय से मेरे हाथ हर बार कोशिश करते तुम्हारी हाथों को थामने की पर बेचारे न जाने किस अनहोनी की आशंका से भयभीत रहते।तुमसे कहना चाहते कुछ मेरे अंदर के भाव पर सामने पाकर तुम्हें सब भूल जाते और भावविभोर होकर आत्मसात कर लेते मिलन के हर एक क्षण को।


चुपके चुपके दुरी का एहसास और जुदाई का भय मेरे जेहन में एक अजीब सा डर पैदा कर देते थे।शाम होना,सूरज का डुबना और फिर एक घनघोर अँधेरी रात जिसका सुबह होता ही नहीं।ख्वाब का आना,टुट जाना फिर भी ये भ्रम की "अब भी कुछ बाकी है शायद"।टुटे ख्वाबों के भी सच होने का इंतजार करना और रात के अँधेरे में भी सूरज की चाहत करना मेरे लिए तो बस आम बात हो गयी थी।
प्रेम के तस्वीरों से गढ़ा हुआ अपना आईना आज चूर-चूर हो चुका है,पर फिर भी हर टुकड़े में ही तुम्हारी तस्वीर देखता और अचानक चूभ जाता एक काँच का टुकड़ा मेरे हाथों में और मेरे खुन से लाल हो जाता फर्श।शायद एहसास दिलाता "अब भी कुछ बाकी है शायद"।ये थोड़ा सा जो भी बाकी है,वो ही तो मेरे जीवन के बुझे हुए दिये में कुछ तेल सा है और मेरे मन की सूनी बागवानी का दो चार फूल है,जो कभी कभी वही खुशबु पैदा करता है जो तुम्हारे करीब होने से महसूस करता था मै।


जीवन का सफर अब बस मेरी खातिर इक बोझ ढ़ोने जैसा हो गया है।बेमन से और बेवजह ही अपने साँसों को इक दिशा देने की कोशिश कर रहा हूँ मै।जमाने वालों को लगता है "अब भी कुछ बाकी है शायद" और मेरे सब खो जाने की पीड़ा का एहसास तो खुद मूझे भी आज तक नहीं हो पाया है।क्यों मिला संसार मुझको पूरा भरा-भरा सा पर इक संसार को पाने के वास्ते खो दिया मैने इक दुजा संसार।वही जो था मेरे प्यार का संसार।खुशबु की वादियों में प्यार का मौसम।मै तुम्हारे सामने और तुम मेरे सामने।गुमशुम से रहते कुछ पल और कुछ पल बुनने लगते अपने ख्वाबों की दुनिया।कभी हँसते और खिलखिलाते हम दोनों और कभी कही छुप-छुप कर एकांत में आँसू भी बहा लेते।
सब कुछ खत्म हो जाने के बाद भी "अब भी कुछ बाकी है शायद"।शायद वो तुम्हारी यादें है,शायद वो तुम्हारी सूरत है मेरी आँखों में बसी या शायद वो मेरा अपना वजूद ही है,जिसमे जिंदा हो आज भी तुम और आँसू हर पल बह कर यही बतलाते रहते है "अब भी कुछ बाकी है शायद"।मेरी धड़कनों में जो साँस चलती है,मेरी चाहतों में जो ख्वाब पलती है और कभी कभी जो बेमौसम ही मेरी रग-रग दिवाली हो जाती है,तुम्हारी यादों की जगमगाती फुलझड़ीयों से तो लगता है "अब भी कुछ बाकी है शायद"।और वो जो कुछ भी अभी बाकी है मुझमें,वही तो हमारे गुजरे अनोखे प्यार की सम्पूर्णता है।