Thursday, December 8, 2011

"टूटते सितारों की उड़ान" में मेरी सम्पादकीय......

"साहित्य प्रेमी संघ" के त्तत्वावधान में हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान" में मेरे द्वारा लिखा गया सम्पादकीय......

जीवन संघर्ष का दुसरा नाम है और काव्य सृजन संघर्षरत मन की व्यथा के उद्गार।इंसान अपने जीवन में बहुत सी कठिनाईयों को झेलता है और परिवर्तन की ब्यार में बहता बहता एक दिन खुद परिवर्तन का पर्याय बन कर रह जाता है।मै मानता हूँ "परिवर्तन संसार की सृष्टि हेतु नितांत आवश्यक है।"पर वह परिवर्तन बस बाह्य हो तो ठीक है,आंतरिक परिवर्तन हमेशा सफल नहीं हो पाता।क्योंकि आज के आधुनिक परिवेश में हमारे चारों ओर बस कृत्रिमता की चादर बीछी हुई है।यहाँ अध्यात्म का नामोनिशान नहीं है और आध्यात्मिक चेतनता के बिना आंतरिक शुद्धिकरण सम्भव नहीं।दुनिया की रंग में रंग जाना बहुत ही अच्छी बात है पर अपने संस्कारों को ताक पर रख कृत्रिमता का आडम्बर रचना सही नहीं।
आज के परिवेश में लोग ऐसा सोचने लगे है,जितना ज्यादा दिखावा उतना ज्यादा फायदा।पर इस संदर्भ में मेरा सोचना थोड़ा अलग है।मै ऐसा सोचता हूँ कि जो वाकई में सुंदर है,उत्कृष्ट है उसकी सुंदरता तो शाश्वत है।उसे किसी भी बाह्य आडम्बर की आवश्यक्ता नहीं वह तो यूँही एक दृष्टि में किसी के दिल में जगह बना लेगा और जहा तक फायदे की बात है तो दुआओं के सामने किसी भी दवा की कहाँ चलती।जिनके सर पर बड़ों का आशीर्वाद होता है वो अपनी राहों के अवरोध को बस फूल समझ कर आगे बढ़ते जाते है।जो व्यक्ति अपनी स्वयं की वर्तमान स्थिती से संतुष्ट है,वही सफल है।क्योंकि सफलता कुछ और नहीं बस आत्मसंतुष्टि है।
कवि का ह्रदय बहुत ही संवेदनशील और भावुक होता है।वह तो संवेदनाओं का ही वाहक होता है।भला उसे छल प्रपंच की क्या समझ।पर जैसा अक्सर देखा जाता है किसी भी क्षेत्र में यदि आपके दस चाहने वाले है तो हजार आलोचक भी पैदा हो जाते है।मै तो मानता हूँ कि हमारे मित्रों से ज्यादा शुभचिंतक वे हमारे आलोचक होते है जो हर पल हमारी त्रुटीयों को बतलाते है और हम खुद में सुधार करते है।कही ना कही जब ये आलोचक हमारी शिकायत करते है,तो ना चाहते हुये भी हमारे नाम को फैलाते है।
मेरी उम्र अभी बहुत छोटी है और साथ ही एक साफ्टवेयर इंजीनियर हूँ।ये दोनों पहलू मेरे साहित्य सृजन के मार्ग में हमेशा विरोधाभाष उत्पन्न करते है।बहुत से लोग अक्सर पूछते है कि क्या एक टेक्निकल इंसान कवि हो सकता है?तब बड़ी शालीनता से मेरा जवाब होता है।जब बचपन से लेकर आजतक मेरे संस्कार ज्यों के त्यों मुझमे जिंदा है तो क्या बस चार सालों की इंजीनियरींग की पढ़ाई के बाद मै परिवर्तित हो जाऊँगा।ऐसा नहीं है मै आज भले ही दुनिया की बाह्य रंगों में रंगा हुआ हूँ पर दिल से ताउम्र एक आध्यात्मिक विचारधारा से भरा,जमीन से जुड़ा इंसान हूँ।क्योंकि मैने जीवन में अनुभव किये है,इसलिये उस परमशक्ति पर अटल विश्वास भी करता हूँ।इस संदर्भ में महान साहित्यकार प्रेमचंद जी ने कहा है "साहित्य ह्रदय की वस्तु है,ना कि मस्तिष्क की।जहाँ सारे उपदेश और ज्ञान असफल हो जाते है,वहाँ साहित्य बाजी मार जाता है।"जरुरी नहीं कि कवि या साहित्यकार होने के लिये हमारे पास अथाह का ज्ञान का सागर हो बस भावनाओं की दो बूँद ही काव्य सृजन की नींव है।
कवि हर विषयवस्तु को एक अलग नजरिये से देखता है।ठीक ही कहा गया है "जहाँ ना जाये रवि,वहाँ पहूँचे कवि।"अब सुनिये मै ही अपने जीवन का एक दिलचस्प वाक्या आपको बताता हूँ।मैने चार साल जहाँ से इंजीनियरींग की वह जगह औद्योगिक स्थल होते हुये भी कुछ ज्यादा विकसीत नहीं थी।पर जब पहली बार तकनीकयुक्त महानगर में पहुँचा  तो वहाँ के हाव भाव देख अचम्भित रह गया।शुभचिंतको और मित्रों की सलाह से कुछ पहनावा,पोशाक और उठने,बैठने की शैली में परिवर्तन आया।मै धीरे धीरे उस शहर की रंग में रंगने लगा।परंतु वह रंगना बस बाह्य था।अंतरमन तो पहले से ही रंगा हुआ था अध्यात्म और मेरे संस्कारों के रंग में जो मुझे अपने परिवार से मिले थे।चूँकि मेरा ह्रदय भी कवि ह्रदय है तो कुछ पंक्तियाँ इस परिवर्तन पर व्यक्त हो गयी पर कवि की सोच बस उपर तक ना देख गहरे भावों समेट को लायी।शहर के बारे में मेरे द्वारा लिखी कुछ पंक्तियाँ परमशक्ति के प्रति समर्पण के भाव में विलीन हो गई।

"मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुम्हीं में ढ़ल गया हूँ।
कौन सी पहचान मेरी,कौन हूँ मै?
तुम हो मेरे या मै तेरा हो गया हूँ।
मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ।"

अंत में अपने सभी पाठकगणों का मै तहे दिल से आभारी हूँ,जिन्होनें हमेशा अंतरजाल पर मेरी कविताओं और आलेखों को सराहा है।आपका प्रोत्साहन ही है जिसके कारण मै आज "टूटते सितारों की उड़ान" काव्य संग्रह" का संपादन कर रहा हूँ।बड़ी ही मश्क्कत और तल्लीनता के साथ मैने २० भावप्रधान कवियों को इस काव्य संग्रह के लिये चुना है।जिनकी भावनायें दिल पर गहरा असर करती है।यह काव्य संग्रह सागर का वह सीप है जिसको मै गोताखोर की तरह गोते लगाकर,प्रतीक्षारत रहकर और संयम के साथ अनमोल मोती स्वरुप प्राप्त किया हूँ।सभी कवियों और कवियत्रीयों को बधाईयाँ देता हूँ साथ ही प्रेरणा के स्त्रोत श्रेष्ठजनों का तहे दिल से आभारी हूँ।
"साहित्य प्रेमी संघ" के साहित्य पुष्पों की बगिया के कुछ सुगंधित और मनोहारी पुष्प आप सब के समक्ष प्रस्तुत है।आप जरुर बताये कहाँ तक पहुँची इन काव्य पुष्पों की खुशबु........पहुँची न आपके दिल तक।.........धन्यवाद।

2 comments:

मनीष सिंह निराला said...

बहुत ही गंभीर कर दिया आपका ये आलेख ..!
प्रेरणादायक प्रस्तुति !

sushma 'आहुति' said...

सशक्त और प्रभावशाली आलेख ..!