Monday, April 25, 2011

एहसास तुम्हारे आने का



कितनी सुंदर लग रही है आज ये सारी छटायें,जो कल तक बेरंग थी मेरे लिए।साँझ की लालिमा में लिपटा बितता पहर आज अपने किसी पुराने साथी सा जान पड़ा जो अब मुझे अकेला नहीं देख पाया और अपनी मद्धम साँझ की लालिमा में यादों के संग समेटता गया मुझे।ये बदलाव शायद इसलिए था कि मुझे तुम्हारी आहटों का पता चल गया था।मै जान गया था कि तुम फिर आ रही हो मेरे पास बस मेरे प्यार की खातिर।उसी झील के किनारे जाकर कई घंटे निहारता रहा उसकी चुप्पी और खामोशी को।ये वही जगह था जहाँ हम कई घंटे बस यूँही बातें करते थे और एक दूसरे की नजर में अपने लिए कितना प्यार है जानने की कोशिश करते थे।तुम पूछती थी "कितना प्यार करते हो मुझसे?" और मै बाहें फैला कर आसमां को उनमें समेटने की कोशिश करता और बताता कि इस अनंत आसमां की चादर भी जहाँ तक सीमित हो जाये,उससे भी आगे तक कई गुणा प्यार करता हूँ तुमको।
आज वो झील फिर से मानों मेरी नजरों में आ बसा है।तुम्हारी परछाई कही झील में दिखती और तुम्हारे आने के एहसास से मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठता।विरह की उन सारी रातों को जिसे बस मैने महसूस किया था,वेदना के उन सारे क्षणों को जिसमें बस खुद ही खुद में बड़बड़ाता कितनी बातें कही थी तुमसे याद कर रहा था मै।तुमसे ये कहूँगा,तुमसे वो पूछूँगा,फिर सोचता क्या कहूँगा तुमसे "तुम तो भूल गयी थी ना मुझे,तुम्हें पता था कि मुझे कितनी याद आती थी तुम्हारी?"कभी सोचता बस देखता रहूँगा तुमको,कही नहीं जाने दूँगा।अगर तुम होगी सामने तुमसे खुब सारी बातें करुँगा और तुम्हारे पहलू में आज खुब रोऊँगा।मेरी आँखों में समाये उस झील का प्रतिबिम्ब आज बरसेगा,नहीं रोकूँगा मै।बस बरसने दूँगा।
फिर यही सब सोचता खोता गया मै पुरानी यादों में और वे यादें मेरे भविष्य की कल्पना गढ़ती रही।सोचता कि कही ऐसा न हो तुम मुझे पहचान ही ना पाओ,तो मै तुम्हें फिर वही गीत सुनाऊँगा जो बहुत अच्छा लगता था तुम्हें।तब तो शायद मेरी आवाज से पहचान ही लोगी तुम और अगर फिर भी ना पहचानी तो वो सारी तकियाकलाम जो मै कहता था और तुम दूहराती थी,उनका सहारा लूँगा।याद है तुमने कहा था,मेरा ये कहना "बोलो ना!"बहुत पसंद था तुम्हें।पर तुम्हारे जाने के बाद हर रोज इन पेड़ों से,आसमां से,झील से और रात को चाँद से बस यही कहता था मै "बोलो ना!"।पर तुम तो शायद सुनती ही ना थी मुझे।
तुम्हारे आने की आश इक नयी जिंदगी की सौगात लेकर आया मेरे लिए।वो जिंदगी जिसने मुझे प्रेरणा दी मेरे खुद के होने का।जिस प्रेम के अस्तित्व ने मेरे मिटते अस्तित्व को एक नयी जिंदगी की नींव दी थी।आज उदासी के हर उन क्षणों के निष्कर्ष का पल था,जो मिला था मुझे तुमसे तुम्हारे जाने के बाद।कई प्रश्न मेरे होंठों पर अब भी थे जिनका जवाब बस तुम्हारे पास था।कई बातें थी जो थी अधूरी तुम्हारे जाने के बाद।आज एक नयी आश लिए वे सभी मुझे इक अनोखे एहसास में सराबोर कर रही थी।झील की गहराई में उतरती चाँद की परछायी और सम्मोहीत करता तुम्हारे आने का एहसास।कई भाव संप्रेषित होकर जाना चाहते तुम्हारे पास और मानों यादों की पालकी पर बिठाकर ले आना चाहते मेरी जिंदगी में तुम्हें फिर से।हर एक पल जो कई सदियों सा गुजरा था अब मानों युग युग की प्यास को तरसता बस मेरे दहलीज में आकर कैद हो गया था।सब शीथिल,शांत और चुपचाप नजरें गड़ाये करते रहे तुम्हारा इंतजार।
हवाएँ मानों रुक गयी और चाँद भी बादलों के ओट से झाँकने लगा।झील अपनी खुशी कल कल की ध्वनि से प्रस्तुत करती और दिल की धड़कन धक धक,धक धक।पलकें अपलक सी बिना गिरे देखती रही और करती रही तुम्हारा इंतजार।किसी स्वप्न सुंदरी सी स्वर्णिम परिधानों में लिपटी आसमां के राहों से पुष्पविमान से आती तुम झील के बीचोंबीच रुक गयी और सम्पूर्ण धरती और अम्बर एक पल थम कर देखते रहे तुम्हें।मेरी साँसे महसूस करने लगी तुम्हारी उपस्थिती और जेहनोदिल में छाने लगी तुम।तुम्हारा सम्मोहन और प्रेममय अंदाज किसी इंद्रजाल सा मेरी धड़कनों की गति को और बढ़ाता रहा और एकाएक आँखे खुली सामने शांत झील और आसमां में चाँद।पर फिर भी एक आश की काश सच हो जाये आज ये एहसास तुम्हारे आने का।   

Saturday, April 16, 2011

तुम्हारे इंतजार की वो रात

चाँद गुमशुम,तारे खामोश और रात की आधी पहर का सन्नाटा और दिल की धड़कन का जोर-जोर से धड़कना,यादों की पालकी पर तेरी यादों का आना और ख्वाबों में तुमसे मिलने की आश लिए सोने की कोशिश करना।कभी चाँद को देखना,कभी तारों से भरी आकाश निहारना,बेवजह दिल को तसल्ली देना आज तो तुम आओगी।रात का पहर ढ़लता गया और मेरी आँखे तुम्हारे इंतजार में और भी जगी जगी सी रहने लगी।उन्हें लगता न जाने कब निंद आ जाये और तुमको देख ना पाऊँ आते हुए।सदियों से वो जो प्यास दिल में था कैद कही सुख ना जाये आँखों में आँसू बन के।
जैसे जैसे ये रात उदास होती गयी वैसे वैसे चाँद भी छुपता रहा मुझ दिवाने से।शायद वो जानता था कि वो तो बस कुछ घंटों में खो जायेगा पर ये दिल की सुनने वाला जागता रहेगा हरदम बस किसी के इंतजार में।कभी कोई मौन सा धुन मेरे कानों से टकरा जाता और कभी कोई आहट शायद कहती मुझसे तुम आ रही हो।ऐसे ही कुछ फासलों पे अक्सर लगता बस अब कुछ पल और फिर तो ये रात इंतजार की नहीं मिलन की रात होगी।


चाँद भी अब थक कर बादलों में खो गया,तारे भी मद्धम मद्धम से होने लगे पर हम अब भी बस नजरे गड़ाये करते रहे इंतजार तुम्हारा।तुमसे शायद यही करार था हमारे प्यार का।बस दर्द,उदासी और इंतजार इन्ही के संग तो जीने की आदत डाल रहा था मै तुमसे प्यार कर के।अकेला बिल्कुल अकेला हो गया मै।अब ना चाँद था ना तारे अब तो धिमे धिमे से रोशनी की पहली किरण आनी शुरु हो गयी थी।मै अभी भी बिल्कुल हतोत्साहीत ना था जानता था तुम तो आओगी ही।थोड़ी देर जो भी हो रही है शायद तुम्हारे आने में वो कही इस चाँद की तो कोई साजिश नहीं।कही तुम्हें देख अकेला वो अपनी चाँदनी समझ तुम्हें आवाज तो नहीं लगा बैठा।
पर प्रेयसी सुनो ना मै यहाँ हूँ न जाने कब से।कई रातों से यूँही तुम्हारे इंतजार में हूँ यहाँ।मै चाँद नहीं हूँ,मै रात नहीं हूँ,मै तो बस दिवाना हूँ तेरा जो अब रात और दिन में अंतर नहीं कर पा रहा तुमसे प्यार कर के।इंतजार की घड़ियाँ बस गिनता है उसे रात या दिन से क्या मतलब।ऊजाला हो या अँधेरा हो बस तुम्हारा इंतजार करता है।आवाज लगाता है,तुमको बुलाता है,और जब ना आती हो तो थक कर फिर निकल जाता है ढ़ुँढ़ने तुमको उस अजनबी रास्तें पर जहाँ पहली बार मिला था तुमसे।
हर रात कुछ खाश होती और तुम्हारे इंतजार की रात तो मानों जिंदगी के बारात की रात हो।कितनी खुशी,स्नेह और हर्ष से भर जाता है ह्रदय कैसे दिखाऊँ तुमको?मरने में भी जीने का मजा और जिंदगी के लिए इंतजार करना कितना कोमल एहसास था कैसे बताऊँ तुम्हें?वो रात भी अजीब था,पता नहीं मिलन की कल्पना से खुश था मन या विरह की अग्न में व्यथीत।पर मन की उत्सुकता तो तुम्हारे इंतजार को और भी विशेष रंग देता था।
तुम मत आना कभी।ऐसे ही हर रात मेरी जिंदगी में तुम्हारे इंतजार की रात होगी।और इक आश के संग जीता रहूँगा सारी उम्र।आज आओगी,कल आओगी,न जाने कब आओगी?पर सोचता हूँ जब तुम्हारे इंतजार में इतना मजा है तो तुमसे मिल कर तो शायद आनंद की प्रकाष्ठा ना पा लूँ।खुली आँखें क्या करे आँसूओं की धार ले आयी सहेज कर और बहने लगे सारे भाव दिल की आँखों से।हर बूँद पुकारता रहा तुम्हें और अब भी जिद करता रहा तुमसे मिलने की।ह्रदय अधीर होकर धड़कता रहा सारी रात और मन कभी इस पार,कभी उस पार होता रहा।एहसास होने लगा कि शायद अब तो  ये इंतजार ही जीने की वजह बन गयी और हम अब से हर रोज रात रात भर करते रहे तुम्हारा इंतजार।

Sunday, April 10, 2011

दिल ने तो बस दिल की सुनी

काश दिल पे थोड़ा जोर होता और तुम्हें पाने की चाहत ही ना करता कभी।ये जानते हुए कि तुम नहीं हो मेरी और ना ही कभी बनोगी मेरी।कहा है तुमपे मेरा थोड़ा सा भी अधिकार,जो तुमसे पूछ लेता क्या मेरी भावनायें नहीं दिखती कभी तुम्हें।ये वही भावनायें है,जो मुझे तुम्हारी तरफ खींचता और सम्मोहीत करता है मुझे तुम्हारी चाहत की खातिर।ये वही भावनायें है,जो कभी बिल्कुल अकेला कर देता है और कभी तुम्हारी यादों की महफिल में ला छोड़ता है मुझे।
कई दिनों से दिल की ये उधेड़बुन क्या करुँ?ना रातों को चैन,ना दिन को आराम।बस होंठों पे आ जाता है तेरा नाम।ऐसा लगता जैसे कोई नहीं है अब साथ मेरे।बिल्कुल तन्हा अकेला बस तुम्हारे इंतजार की आश के संग जगता।सोचता कह दूँगा आज तुमसे अपने दिल की बदमाशी,जो न जाने कब से छुपाये बैठा है ये अपने अंदर।सोचता आज पूछ लूँगा तुमसे क्यों तड़पाती हो इतना,बेवजह बिना आहट के मेरे सपनों में आकर क्यों हर रात तंग करती हो मुझे?फिर सोचता तुमको क्या पता ये मेरी कहानी,ये तो मैने खुद बनाया है।खुद प्यार करता हूँ तुमसे और खुद बुला लाता हूँ तुम्हें अपनी यादों में और अपने सपनों में।
हिम्मत से आज तुमसे कहने आ रहा हूँ मै अपनी दिल की बात जो अब बड़ा दर्द देता है मुझे।वीरान राहों में अक्सर तुम्हारे ख्यालों में ला छोड़ता है।आज नहीं जरुरत थी किसी भी भूमिका की आज तो दिवानेपन की शाम थी।आज नहीं था कोई भय प्रतिकार का,आज तो बस दिल की ही सुननी थी।कुछ सोचता कभी और एक कदम पीछे हट जाता पर दिल की आवाज मुझे तुम्हारे पास लाकर खड़ा कर देता।बेचारा दिल भी आखिर दिल के वास्ते मजबूर हो जाता और परिणाम की चिंता छोड़ इजहारे मुहब्बत कर देता तुमसे।


अब थोड़ा सा चैन मिल जाता दिल को पर असमंजस की वो स्थिती जो अब आने वाली थी अंदर तक झकझोरती रहती।क्या तुम मेरा साथ दोगी या इस बेसहारे को और अकेला छोड़ दोगी अपने खुद के हाल पे?पहले तुम पूछती ये क्या कह दिया तुमने और फिर गुमशुम हो जाती।तुम्हारी ये खामोशि कौन सा जवाब था,क्या समझ पाता मै।शायद मेरी उदासी के पहर की शुरुआत का पल था वो,जब तुमने मेरी भावनाओं को रौंद कर मेरे दिल पे जख्मों का वार कर प्यार का प्रतिकार किया।ठुकरा दिया तुमने बस एक पल में मेरी हर चाहत को और दिल के आँसूओं के सैलाब में कई रात यूँही बहता रहा ये दिल बेचारा।
किस कसूर की सजा पा रहा था ये दिल,ये तो शायद दिल को भी ना पता था।बस अब भी तुम्हारे प्यार के दो आँसूओं को सम्भाले तुम्हारे प्यार की कयामत का इंतजार करता।उस कयामत का इंतजार जो तोड़ देता दिल को दिल ही दिल में और अफसोस भी ना कर पाता दिल,दिल ही दिल में।आखिर दिल ने तो बस दिल की सुनी।वो कहा जान पाया तुम्हारे दिला का हाल।उसने आज भी यूँही बसा कर रखा है तुम्हारी वो यादों की तस्वीर दिल में।मानता हूँ तुम नहीं हो मेरी पर दिल तो बस दिल तक पहुँच ही जाता है कभी कभी यादों की पुल बना कर।
ना कोई अफसोस और ना कोई शिकवा तुमसे।बस इक इच्छा दिल की तुमसे दूर जाने की।शायद खुशियाँ लौट आये जीवन में तुम्हारे मेरे दूर जाने के बाद।तुम खुश रहो,मुस्कुराती रहो और बस हरदम अच्छी रहो।यही तो है मेरे दिल की चाहत जो कभी मैने कह दिया था तुमसे।सब समझते है,कि तुमने तो ठुकरा दिया था मेरे प्यार को पर तुम्हारे जीवन की हर एक मुस्कान ही तो मेरे प्यार के स्वीकार्य आमंत्रण का परिणाम है।उस वक्त दिल ने तो बस दिल की सुनी और बस तुम्हारे बिना जीवन में है एक कमी।ना जाने क्यों सब पाकर भी दिल की वो बगिया मेरी अब भी है सूनी सूनी।  

Monday, April 4, 2011

उन रातों की बेसुधी

अरमानों को नजरअंदाज कर और भावनाओं को दिल में दफन कर इंसान ज्यादा दिन तक रह नहीं सकता।इसका एहसास होने लगा था मुझे।आज का दिन कुछ विशेष था मेरे लिए यूँ कहे जिंदगी में पहली बार जिंदगी से मुलाकात हो गयी थी।आज सारी दुनिया,सारे सपने और सारे अपने सब को भूल बस तुम्हीं में खो जाने को दिल करता था।बिन माँगे सब कुछ पा कर मै कुछ ज्यादा ही उत्साहीत हो गया था।कदम जमीन पड़ नहीं पड़ते थे।लगता था बस आसमां में उड़ रहा हूँ तुम्हारे अरमानों के पँख लगा कर।कोई भी गीत और संगीत अब दिल को भाता ही नहीं था।अब तो मै बस तुम्हारी मीठी बातों का दिवाना था।वे मीठी बातें जो मेरे प्यार भरे जीवन में इक अनोखे रस सा घुल रहे थे।
धीरे धीरे झुरमुट से झाँकता चाँद मानों तुम्हारा दीदार कर रहा हो,और कभी लगता मानों वो तुम ही हो,जो मुझसे शर्मा कर कभी कभी बादलों के आँचल में छुप जाती हो।इंतजार की वो रात,अपने प्यार की पहली रात कैसी थी बस महसूस कर रहा हूँ,कहने में असमर्थ हूँ।वो इक गीत मेरे कम्पयूटर में बजता रहता "चाँदनी की ना तो चाहत है,ना सितारों की जरुरत है...." और मानों इक अजीब सा माहौल पैदा कर देता वो तुम्हारे इंतजार का।आठ,नौ और दस बस घड़ियाँ बढ़ती जाती बहुत जल्दी जल्दी और मै चाह कर भी रोक ना पाता उस रात को।अब तो रात के बारह बज गये थे।चारों ओर खामोशी और सन्नाटे छा चुके थे।पर मेरे दिल के नगर में तो अजीब सी हलचल थी।तभी तुम्हारे कदमों की आहट सा मोबाईल का रिंगटोन फिर वही गीत बजा कर पुकारने लगा।धीरे से तुम्हारा बोलना "आप सो गये क्या" और मानों बस तुम्हारे इतना कहने पर मैने तो अपनी तमाम रातों की नींद ही सौंप दी तुमको।
कितनी बातें थी हमारे बीच कुछ समझ ही नहीं आता।ऐसा लगता कई सदियों से मैने कुछ ना कहा हो तुमसे और सारी बातें बस अब हो रही।तुम भी धीरे से कहती और मै भी धीरे धीरे अपने प्यार के उस अजनबी मँजिल तक पहुँचने की कोशिश करता।तभी मै तुमसे माँगता एक ऐसा शब्दों का उपहार जिसे सुनकर कोई भी प्रेमी जन्नत सा सुकुन पा ले और तुम बेवकूफ कुछ ना समझ पाती और बस बोलती रहती "क्या पता"।आखिर में हार कर जैसे ही मै तुम्हें बताने जाता उस अनोखे प्यार के उपहार के बारे में तुम कहती ठहरों मुझे पता चल गया और मै तुम्हारे विचारों के लिए प्रतीक्षारत रहता।कुछ देर बिल्कुल शांत हो जाती तुम।ना कुछ मै बोलता,ना कुछ तुम बोलती और फिर शरमाते हुए कहती "मै तुमसे प्यार करती हूँ"।मै सुन कर फिर से कहता क्या कहा तुमने फिर से कहो ना,कुछ सुनाई नहीं दिया और तुम गुस्सा के कहती हो गया मुझे अब नहीं बोलना।
तुम जानती थी मैने सुना था प्यार के उन शब्दों को।तुम्हारे इजहार को मैने कैद कर लिया था कही अपनी यादों के घरौंदे में।वो तुम्हारे शब्द मेरे लिए "पहली रात की वो आखिरी बात" बन गये थे,जिन्हें बड़ी दुर तक जाना था साथ मेरे।शायद तब तक,जब तुम ना हो वे शब्द मेरे हमराही मुझे इक हिम्मत देंगे जीने की।बातों में कुछ पता ना चला और खिड़की से ऊजाले की रोशनी कमरे में आने लगी और मैने तुमसे कहा भोर हो गयी शायद।पर अब भी लगता कहाँ हुई कुछ बात और खो जाते फिर सब को भूल हम अपनी बातों में।
पूरे दिन बेसुध से हम और रात भर तुम्हारी आहटों का इंतजार करते करते अब भी हम भोर तक जगते है।शायद ये सोच कर कि कभी तुम्हारा फोन आये और तुम कहो "अरे सुबह हो गयी,अब सो जाओ वरना तबीयत खराब हो जायेगी"।पर अब तो बस यादों के पन्नों में दिखता है मुझे उन तमाम रातों की बेसुधी का आलम।आँखों से नींद का दुर जाना और पलकों पे तुम्हारे ख्वाबों का  कुछ देर ठहर जाना अब भी कभी हँसाता और बेवजह ही रुला जाता है मुझे।उन रातों की बेसुधी अब भी शायद इंतजार करती है तुम्हारा और तुम्हारे फोन का........।